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जीना सिखाना भूल गए

June 22, 2021


परिवार और समाज के सामने किया था
वादा उम्र भर साथ निभाने का
हर कठिनाई का मिल कर करेंगे सामना
बनाएंगे एक सपनो का आशियाना

मैं थी भोली नादान, तुमने जीना सिखाया
एक अधखिली कली को खिलना सिखाया
मेरी नादानियों को कर नजरंदाज
हर मुश्किल का सामना करने का पाठ पढ़ाया
दुनियादारी की डगर पर चलना सिखाया

अभी तो सीख रही थी कदम से कदम मिला चलना
अभी तो पहुंची थी कंधे के बराबर तुम्हारे
थाम लेते थे हाथ मेरा ठोकर लगने का होता था अंदेशा

दो बदन एक जान, तुममें बसते थे मेरे प्राण
सुख दुख में साथ छोड़ेंगे ना यह था हमारा वादा
शायद इसीलिए दोनो को एक साथ हुआ कोरोना
कमरे में बंद तुम और मैं, सबसे दूर एक दूसरे के करीब
कितने रंगीन पल थे वो, बाते करते रहते तुम और मैं

कल ही तो कहा था तुमने बाकी है बहुत कुछ सीखना
अभी तो सीखा नही था तुम्हारे बिन चलना
फिर अचानक क्यों साथ छोड़ दिया मेरा
भरी दुनिया में कर दिया तन्हा

बेल की तरह तुम्हारे सहारे बढ़ रही थी में
क्यों वो सहारा खींच लिया तुमने
जीवन की नदिया पार कराने कोई मांझी नही है मेरा
जिंदगी मानो एक बंजर बाग रह गई है
माली छोड़ आशियाना चला गया है
जिंदगी तो तेरे साथ थी मेरे हमसफर
अब तो मौत ही हमसफ़र नज़र आ रही है
सब कुछ सिखाया तुमने
बस अपने बिना जीना सिखाना भूल गए

खुद के लिए जीना सीख लिया मैने

June 20, 2021

किसी की एक नजर के लिए सजती संवरती थी
अपने श्रृंगार की तारीफ सुन मन ही मन इठलाती थी मैं
पर अब दूसरों की खुशी के लिए संवरना छोड़ दिया
जो मुझे पसंद वो करना सीख लिया मैने

मेरा रूप है मेरा अपना
हक नही है इसपर किसीका
फिर क्यों सजू संवरू किसी की खुशी के लिए
तरसू क्यूं किसी की नजर के लिए

कब तक जीयूंगी दूसरों के लिए
कब तक चुप रहूंगी अपनो की खातिर
घुट घुट कर रहना छोड़ दिया मैंने
खुद के लिए जीना सीख लिया मैने

मै अब सजती हूं खुद के लिए
मेरा हर श्रृंगार है मेरे लिए
बहुत जी ली मर मर दूसरों के लिए
अब जी रही हूं अपने लिए

अभी भी अच्छा लगता है कोई नजर भर देखे
खुद की तारीफ सुन मन लगता है डोलने
पर अब कोई ना देखे या प्रशंसा के दो बोल ना बोले
तो फरक नही पड़ता मुझे
क्योंकि खुद के लिए जीना सीख लिया मैंने

डॉक्टर

June 19, 2021

आइए मिलाते है सबको, कहते है डाक्टर जिनको,
हाथों में इन के है जादू, हर बीमारी को रखते है काबू,

कहते है धरती पर भगवान का अवतार है ये,
मझदार में डूबती नैया की पतवार है ये,
हर दर्द की दवा है इनके पास,
हमारे जीवन की है ये आस ।

सच तो ये है कि बीमारी में भगवान
से पहले करते है इनको याद,
एक मीठी मुस्कान,एक आश्वासन के साथ
फूंक देते है मरीज में वापस जान।

इनको अपनी जान की परवाह नहीं,
खुद के दुख तकलीफ से गिला नहीं,
अपने परिवार से पहले देते है रोगियों को मान,
24×7 काम करना यही है इनकी पहचान।

डिग्री लेने से पहले सब करते है समाज सेवा का इरादा,
धर्म जाति,अमीर गरीब को भुला एक सा इलाज करने का वादा।

कोरोना काल में सबने किया है कमाल,
अपनी जान पर खेल रखा है सबका ख्याल,
कितनो ने अपनी जान गवाई
पर फिर भी इन्होंने हार ना मानी।

कितना नेक है करते काम,
दिन रात सुबह शाम,
सिर झुकता उनके सम्मान में ,
आभार के शब्द नहीं है मेरे पास में।

पर समझ नहीं पाती ?
जब काम करते हैं इतना परोपकारी,
जब किया है जान सेवा का वादा ,
फिर क्यूँ बहुतो ने बदला अपना इरादा ?
पैसा कमाना हो गया है सेवा पर भारी,
देखते नहीं मरीज की लाचारी ।

अस्पताल चाहे निजी या सरकारी ,
बन गए है पैसा निकालने की खदान,
चाहे कैसी भी हो बीमारी
लाखो का बिल बना
भूल जाते सब अपने दीन ईमान ।

डॉक्टरों के धंधे में भी छल कपट ने
जमा लिए है अपने कदम ,
मरीजों से मुंह मांगा पैसा लेना बन गया इनका धर्म,
दवा से लेकर ऑपरेशन तक हर तरफ है बेईमानी,
कोई उसूल नहीं,कोई नियम नहीं, सब कर रहे मनमानी

हर धंधे की तरह चिकित्सा में भी
भ्रष्टाचार हो गया है नया शिष्टाचार
जान बचाने वाले के आगे हर मरीज जाता हार ।

हाथ जोड़ विनती है इन नेकी के पुतलों से
ईश्वर के देवदूत ,सेवा में लीन डाक्टरों से
पैसा कमाने में कोई बुराई नही, हक है सबका
पर झूट बोल धोखा दे गरीबों को लूटो न
पुण्यात्मा हो आप, दया की मूरत हो आप
अपनी प्रतिज्ञा को भूलो न
पूजते है तुम्हे हम भगवान के जैसा
करते हैं तुम पर विश्वास खुद से भी ज्यादा
बस इस आस्था को तोड़ो ना।

Story of a Lawyer & Doctor

June 18, 2021

A Dentist Dcotor met a Criminal Lawyer
In a crowded Hotel foyer
It was love at first sight
Which resulted in sleepless nights

Their professions were so diverse
As if they were in different universe
While he was in Court attending to cases
She was in her Clinic, working on faces

While he was occupied with bails and convictions
She was busy with Extractions and Injections,
While he was involved in hearings and Legalities,
She was handling Surgeries and Cavities

Each was so immersed in their respective professions,
Neither could find time to give each other attention
They they again met in a coffee shop
And decided to tie the knot

Everything fell into place since then,
All Clients and Patients had to wait their turn,
As a lot about each other they began to learn,
No one mattered more than the other,
They now gave priority to one another,

Helping each other in a wonderful teamship,
TWOgether they built a beautiful relationship,
Doctor of teeth and doctor of criminals
Noble is their profession
As both heal others

Living a life of love and harmony,
so serene and smooth,

My Doctor daughter in love andmy Criminal Lawyer son are made for each other

and My Lord that’s the truth (tooth)nothing but the truth(tooth)

अमलतास

June 15, 2021


बचपन में गर्मियों की सुबह की पहली किरण के साथ
भाग दोस्तो के साथ पहुंच जाते बगीचे के पास
जहां पीले पीले फूलों से लदी डालियां
मानो देती थी न्योता
दूर से ही सूरज की रोशनी की तरह दमकते
फूलों की सुंदरता से चुंधिया जाती आंखें
जमीन पर बिखरे फूलों समेट कानो की बाली
माथे का टीका बना खुद को सजाते
बालपन की मासूम बुद्धि समझ न पाती
जहां सारी दुनिया गर्मी की आग से तपती
ये पीले पीले फूलों के झूमर कैसे मुस्कराते हुए झूलते?
क्यों सिर्फ कुछ दिनों के मेहमान होते है ये फूल
बाकी समय क्यों जाते मुझको भूल?

समय के साथ इस मायानगरी के मशीनी जीवन में
मैं भी गई उस पुराने दोस्त को भूल
पर आज एक बार फिर दिल कर रहा मजबूर
वापस जाऊं उन गलियों में , यादें करूं ताजा
एक बार फिर देखूं वो सुनहरी फूलों की बिछी चादर
वो हवा में झूमते अमलतास के फूल।

अंजू गांधी

समाज का कीचड़

June 12, 2021

आज की न्यूज -Mumbai में red alert
जोरदार बारिश से सड़के बनी नदिया
और आने वाले कल की news होगी-
बारिश के बाद शहर की सड़को का पानी उतरा
पर अपने पीछे पीछे जगह जगह कीचड़ छोड़ गया
राहगीरों को चलना हुआ दुश्वार,जनता हुई परेशान
कीचड़ के छींटो से कपड़े और चेहरे हुए खराब

ये सब सोच मन में विचार आया
बाहर की गंदगी और कीचड़ से सबको परेशानी
समाज में फैले और मन के अंदर की
गंदगी किसी ने न जानी
कब तक बांधे रखेंगे अपनी आँखों पर पट्टी
खोलो आंखे देखो समाज में फैली गंदगी ।

दिल में छुपा राग द्वेष, आपसी जलन
एक दूसरे को नीचा दिखाने की ललक
अहंकार, क्रोध, पैसे का अभिमान
मिलकर बनता है ऐसा बदबूदार मिश्रण
होता मैला जिससे इंसान का तन मन
ये क्या किसी कीचड़ से है कम?

समाज में फैली अराजकता, जाति धर्म के दंगे
नेताओ के लुटने के धंधे,देशद्रोहीयो के गंदे मंसूबे
हर कोने में छुपे घोटालों के कीड़े
जगह जगह बने है भ्रष्ट्राचार के गड्ढे
जिसमें छोटे बड़े सब है डूबे
चापलूसी, रिश्वतखोरी का बना है दरिया
इनमें जो घुसा वो दलदल की तरह फंसा
विचारो की संकीर्णता, भावो की गंदगी
मिलता इसमें जब लालच का रसायन
बनता है जो मिश्रण
वो क्या किसी कीचड़ से है कम?

हर कोई स्वार्थ के कीचड़ में धंसा जा रहा है,
यश लोलुपता में पहचान अपनी खो रहा है
हर नेता चलाता स्वच्छता अभियान
झाड़ू उठा देता नया पैगाम
है कोई जो आए सामने
समाज में फैली विचारो की गंदगी
को साफ करने की आवाज उठाए
एक दूजे पे कीचड़ उछालने के बजाय
खुद सफाई का बीड़ा उठाए
क्यों न खुद से शुरुआत करे
अनैतिक भावो और कमों का कर बहिष्कार
बनाए साफ सुथरा समाज

कीचड़ की आत्मकथा

June 11, 2021

हैरान क्यों है यह पढ़ कर? हंसिए मत।
क्या मैं अपनी आत्मकथा नही कह सकता?

जी हां मैं कीचड़ हूं, काला, लिपचिपा, बदबूदार जिसे कोई पसंद नही करता। सब मुझे हमेशा दुत्कारते हैं। हिकारत भरी नजरो से देखते हैं। मेरे से दूर दूर भागते है। मै जरा सा किसके शरीर को छू लूं तो वो चिल्लाने लगता है, एक दम जाकर पानी से अपने को धो लेता है, जैसे की मैं कोई अछूत हूं और मेरे छुने भर से उसका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।

कभी सोचा है मेरे मन पर क्या गुजरती है?
क्या मेरी भावनाएं नहीं है?
क्या मेरा ये रूप मैने खुद ने पसंद किया?
क्या मेरा मन नहीं करता की लोग मेरे पास आए जैसे नदी, तालाब के पास घूमने जाते है। मेरे किनारे बैठ कर घंटो दोस्तो के साथ बातें करे, प्रेमी प्रेमिका जीवन भर साथ देने की कसमें खाए?

आप शायद भूल गए है की बचपन में आप सब मेरे में बहुत खेले हैं। मेरेमे कूद कूद कर राहगीरों के ऊपर छींटे उड़ाए है।
आज भी बच्चे मेरे में खेलना पसंद करते हैं।
मेरे कारण कई बार उन्हें बहुत डांट भी खानी पड़ती है
फिर भी उनका मेरे प्रति प्यार कम नही होता। मना करने पर जब भी वे मेरे पास आते है और मुझे बहुत खुशी होती है कि कोई तो मुझे पसंद करता है।

बोलिए मेरी इस हालत के जिम्मेदार कौन है? क्या मैं?
नही, मेरे इस रूप के जिम्मेदार आप सब, जी हां आप सब हैं यानी इंसान।

आप लोग जहां तहां कचरा फेंक देते हैं, घर की गंदगी, कारखाने का वेस्ट, या आपके भाई बहन कहीं पर भी मलमूत्र का त्याग करते है।
और फिर गंदगी का ढेर बनता जाता है, उसपर अगर वर्षा आ जाए या कोई भी थोड़ा सा भी पानी डाल दे तो बस हो जाता है मेरा जन्म।
या फिर कहीं मिट्टी पड़ी हो और उसपर पानी डाल दो तो मेरा जन्म हो जाता है।
कूड़ा करकट, गंदगी, आपके घर का झूठा , बचा, बासी खाना आदि कितनी ही चीजे मेरे अंदर जमा होती रहती है और मेरा विकास होता जाता है

इन सब सामान के सड़ने से एक गंदी बदबू पैदा हो जाती है जो वातावरण को दूषित कर देती है।
पानी और गंदगी के मिश्रण से कितने जहरीले रसायन मेरे अंदर पैदा हो जाते है जो मेरे रंग को काला कर देते है

कई बार मेरा मन भी करता है कि मैं आपसे मिलूं, शायद इसी वजह से आपके मेरे पास आते ही मैं आपकी तरफ लपकता हुं पर मेरे अंदर आप लोगो द्वारा फेंकी गई गंदगी के कारण मेरे आपको छुने मात्र से आपके कपड़ो पर और शरीर पर दाग लग जाता है
और आप सब मुझे कोसने लगते हो।

सच बताऊं आपसे अच्छे तो वो किसान है जो मेरे में अपने बदन को गीला करके आप लोगो के लिए अन्न और सब्जी उगाते है।

उनको परवाह नही होती की कीचड़ में उनके पैर या कपड़े खराब हो जाएंगे बल्कि वे तो मुझे नजरंदाज कर मुझ में घूम घूम कर आपके लिए फसल उगाते है।

कमल का फूल जो आप देवी या भगवान के चरणों में चढ़ते है वो मेरे में ही उगता है, आप उसको तो नफरत की नजर से नहीं देखते, फिर उसको जन्म देने वाले कीचड़ का क्यूं अपमान करते हो?

क्या मेरे में उपजी सब्जी , फल और अन्न आप नही खाते ? तो फिर क्यों उस माध्यम से घृणा करते हो जिसमें सब्जी या अन्न पनपा है?

सच बताऊं तो इससे आप इंसानों के दोगलेपन का पता चलता है।
जिससे अपना मतलब निकाले, जो आपके काम आए सिर्फ उसको पसंद करो, उसको महत्व दो। जिसने उस काम की चीज को बनाया उसका निरादर करना कोई आप लोगो से सीखे।
आप लोगो के मन में कितना कीचड़ भरा है। वो आपको नही दिखता। क्योंकि आप ऊपरी चमक और रूप को ज्यादा मान देते है

मुझे अफसोस नहीं है की आप लोग मुझे पसंद नही करते। और मुझे कुछ खास फरक नही पड़ता आपकी नफरत या अपमान से। क्योंकि मैं अपना महत्व जानता हूं।

मै जानता हूं कमल मेरे बिना खिल नही सकता, फसल मेरे बिना पक नही सकती।
सुअर जिसको सब दुत्कारते है उसकी तो मैं पहली पसंद हूं। उसका कोई भी घाव हो मेरे में लोट कर वो अपनी सब तकलीफ,अपना अपमान सब भूल जाता है।
और एक बात बताऊं?
रिसर्च से मालूम पड़ा है की मेरे अंदर कुछ ऐसे सूक्ष्म जीवाणु पनपते है जो की बहुत उपयोगी होते है
साइंस ने ऐसी प्रणाली ढूंढ ली है जिसके कारण मेरेमें से लाभदायक रसायनों और जीवाणुओं को निकाला जा सकता है और मेरेका नया नाम दिया जाता है ” सक्रिय कीचड़ और थोड़े से केमिकल treatment के बाद मेरा नया जन्म होता है जैविक कीचड़ के रूप में ।
हरे खेत के लिए उर्वरक या मिट्टी के कंडीशनर के रूप में सुखाया जाता है, खाद और मिट्टी के कंडीशनर के रूप में उपयोग किया जाता है।
मैं भी किसी काम आ सकता ही सोच मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है और मैं अपना अपमान और आपकी नफरत को भूल जाता हूं।
और आपको मेरे से इतनी ही घृणा है और अगर आप इतने समाजसेवी हो तो कीचड़ मत फैलाओ, पर्यावरण का ध्यान रखो। ऐसा कुछ मत करो की हर जगह कीचड़ के ढेर बने। दूसरों की व्यथा को समझो।
अंत में एक ही बात कहना चाहता हूं किसी को भी हिकारत की नजर से ना देखे। कभी कभी बेकार की चीज भी काम आ जाती है।

काफी हुआ

June 9, 2021

हक के लिए आवाज उठाने पर ,
सदा पिसती रही, घुटती रही,
जो हो रहा है होने दो, कल सब ठीक होगा,
सुन सुन हर पल सहती रही,

कभी मारा तो, कभी दुत्कारा उसे,
कभी नोचा तो कभी सरेआम नचाया उसे
चीज़ समझ मोल भाव लगाया तो,
कभी पांव की जूती समझा उसे,

पत्थर की मूरत को देवी समझ पूजा
मगर जिंदा नारी को सिर्फ एक शरीर समझा
कभी अपनो ने तो कभी अजनबी सायों ने
कुचला है उसके अरमानों को,

कहने को तो है वो बहुत महान
फिर भी मिला नही उसे उचित स्थान
हर क्षेत्र में है अपनी धाक जमाई
फिर भी दो शब्द प्रशंसा के ना सुन पाई

कब तक सहेगी कब तक घुटती रहेगी वो?
काफी हुआ अब  समझ चुकी है वो,
अपने को पहचान चुकी है वो
ना झुकेगी, ना डरेगी,
अपने आत्मसम्मान और हक के लिए लड़ेगी,
पुरुष की मैं के आगे , अपने अहम को न मरने देगी

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पुरुष और नारी का संवाद

पुरुष -.
नौकरी करने से रोका नहीं
बाहर घूमने जाने पर टोका नहीं
अर्धगानी अर्धांगिनीका दर्जा दिया
पूजा में साथ बैठने का मौका दिया
क्या ये काफी नहीं

घर संभालने की आजादी दी
रिश्ते नाते, दुनियादारी निभाने की जिम्मेदारी दी
जो चाहो करो पर आज्ञा लेकर करो
कोई रोक नही,  क्या ये काफी नहीं

नारी

आसमां पर चढ़ा, फूलो की सेज पर बिठा
दुनिया दिखाने को औरत का सम्मान बढ़ाया
कर्तव्य सब याद दिलाए पर अधिकार सब छीन लिए
मैने आज्ञा दी, सब करने की छूट दी
कह नारी की सफलता का सेहरा खुद के सिर बांधा
यह सब कह तुम ने अपना अधिकार जताया
खुद को महान बता नारी को नीचा दिखाया

आज की नारी किसीकी आज्ञा की मोहताज नहीं
सक्षम है सब करने में ,कोई उसका सरताज नही
बराबरी की हकदार है,उसको सब अधिकार है
पुरुष की गुलामी और आज्ञाकारी बनना और
पति को  भगवान समझ पूजना अब काफी नही

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परछाई

June 5, 2021

वो डरती है अंधेरों से
शाम को आंगन में उतरे काले साए से
डर जाती खुद की देख परछाई
उसके मन की दशा
खुद उसकी मां जान कर भी कुछ कर ना पाई

गुड़ियोंसे खेलने के दिनों से ही डरने लगी थी वो
अंजान से ही नही, अपनो से सहमने लगी तो वो
सूरज की पहली किरण से आती थोड़ी सी मुस्कान
सूरज के ढलने तलक खुद ढल जाती वो
चांद की छवि से भी डरती थी वो
रात के काले सायो से सिहर जाती वो

समय के साथ बढ़ती गई
मासूम कली फूल बनती गई
पर वो शाम के अंधेरों का डर
वो अपनो के पास आने का डर
कुम्हलाता गया उसको हर पल

बचपन से पिता की गोदी में मचलती थी जो
अचानक उनसे कतराने लगी वो
पिता के गले से झूलने वाली
पिता के स्पर्श से भी घबराने लगी

कोशिश करने पर भी किसीको दिल का राज बता ना पाई
खुद की जननी सब जानते हुए भी कुछ कर ना पाई
चांद की पहली किरण के आते
कातर नजरो से देखती मां को
पर वो लाचार नजर झुका मुंह फिरा कतरा जाती
यह मासूम समझ न पायी
बेटी तो होती है मां की परछाई
पर ये मां अपनी परछाई को क्यों बचा ना पाई
पत्नी और मां के बीच
अपने अन्दर की औरत को कहां छुपा आई?

शाम होते ही मां बेटी दोनों सूरज की तरह ढल जाती
जरा सी आहट होते ही अपने में सिमट जाती
खिड़की पर देख किसकी का भी साया
दोनो आपस में लिपट जाती

फिर एक दिन मां ने हिम्मत जुटाई
बेटी की इज्जत के लिए पति के सामने आवाज उठाई
वहशी दरिंदे का सामना जब ना कर पाई
रात के अंधेरे में पति को मार
खुद अपनी और बेटी की चिता सजाई

अब ना सूरज की किरणे झांकती बंद खिड़कियों से
ना चांद की चांदनी उतरती घर के आंगन में
जले हुए घर से झांकते है काले डरावने साए
जो रोते हुए आवाज लगाते
ओ वहशियो लगाम दो अपने वासना के घोड़ों को
बक्शो बाप बेटी के पवित्र रिश्ते को
नही तो हर बेटी डरेगी खुद के पिता की परछाई से

मैं नहीं किसी की परछाई

June 5, 2021

बहुत हो गया अब ना चुप बैठूंगी मैं
बहुत सहन किया अब तो मुँह खोलूंगी मैं
सह लिया बहुत जुल्मोसितम
पर अब सब पर भारी हूँ,
क्रांति की चिंगारी ,परिवर्तन की आग हूँ मैं
दुर्गा,चंडी और काली दुष्टों का वध करने वाली हूँ मैं
इस सृष्टि की रखवाली ,धरती की मैं हरियाली हूँ,
मुझ में है अदम्य क्षमता , कम नहीं किसी से मैं
इतिहास साक्षी है मेरे वजूद से,कभी हारी नहीं मैं
अब नहीं कैद घर की चारदीवारी में
निकली हूँ बाहर खुद से मिलने को
दुनिया को अपनी पहचान कराने
क्यों अब रहूं डरी सहमी?
क्यों चलू बन के किसी की परछाई ?

हर रूप रंग , रिश्ते में ढलने की कला में माहिर हूं मैं
कितने जख्मों को सहती, पर करती नही जाहिर मैं
गुणों की खान हूं मैं, देवताओं का अभिमान हूं मैं
पहचान चुकी हूं अपनी शक्ति को
शायद तुमको आभास नहीं,
नारी बिन इस दुनिया में जीवन का
कोई भी प्रकाश नहीं।
बिन नारी इस दुनिया में, न मैं रहूंगी, न तुम होगे,
नारी है तो सब कुछ है, शायद तुझको विश्वास नहीं।
पर हो गया आज विश्वास मुझे,
विध्वंस करे पापियों का, उस आग की चिंगारी हुं मैं
पुरुषों की दुनिया में मैने अपनी जगह बनाई
अब क्यों रहूं बन के किसी की परछाई?

मैं हूं जगत जननी जिसने संसार बसाया ।
परिवार को बना संस्कारो का पाठ पढ़ाया
मैं शक्ति हूँ.समाज की सबको जीना सिखाया
मैं शक्ति हूँ स्वयं की खुद के सम्मान को बचाया
जान चुकी हूं अपनी शक्ति को
क्यूं आत्मसम्मान को कर निछावर
बनू किसी की परछाई?

अबला नहीं सबला हूं मैं, पास हुई हर इम्तहान में।
अपमानित सदैव हुई , फिर भी आगे सबके सम्मान मैं।
आज के युग की नारी में है गजब की क्षमता
आसमान की बुलंदियों को छुए
असंभव को संभव कर दिखाए
जीने का जज्बा है उसमे,
सपने को पूरा करने का हौसला उसमे
हर क्षेत्र में सबसे कंधे से कन्धा मिलाये
देश चलाये, हवाई जहाज उड़ाए
पुरुषों की इस दुनिया में सिर ऊंचा कर कदम बढ़ाए
फिर क्यूं किसी के आगे झुंकू
क्यों जीयूं बन परछाई

माँ को होता था गर्व
जब लोग कहते है मैं हूं उसकी परछाई
उसका ही अक्स है मुझमें , उसके ही गुण
सुन कर मां फूली न समाती
पर क्यूं वो तब समझ न पाई
क्यों बनूं मै उसकी परछाई
कुछ अलग खुद से ज्यादा , जो बनाये अपनी पहचान
ऐसा क्यों नहीं किया इरादा
पर आज जान चुकी है हर नारी
परंपरा की बेड़ियों को काट आगे निकल गई है सारी
हर मुकाम पर सिक्का जमाया उसने
फिर क्यूं सिर झुकाए घूमे बन परछाई

आज खुद पर मान है मुझे
अपनी शक्ति पर अभिमान है मुझे
नही झुका सकता कोई
नही आवाज दबा सकता कोई
बहुत हो गया ,किया है खुद से वादा
नही जीयूँ बनकिसी का साया
न रहूं बन किसी की परछाई
परछाई तो है क्षणिक की माया
समय के साथ बदले,अंधेरे में हाथ छुड़ाए
बनूं तो बनू, मैं छाया
जो है सुख दुख की साथी
पनाह दे सबको शीतलता का आभास कराए

दिल के गहरे राज

May 29, 2021

हर कोई घूमता यहां दिल में दर्द छुपाए
हजार राज सीने में दबाए,
चेहरे पर बनावट का मुखोटा लगाए

सबकी आंखों में धूल झोंकना हो गई आदत जैसे
छोटे से दिल में छुपाए घाव अनेक
कुछ सुख गए कुछ बन गए नासूर
चाहे बाहर लगें ठहाके, भीतर है एक उदासी,

जैसे सागर भरा जल से ,पर लहरे है प्यासी
ऊपर-ऊपर गीत मिलेंगे, भीतर तो क्रंदन मिलेगा,
मुख पर झूठी चमक ,पर कुम्हलाया हर वदन मिलेगा।
रंगमंच हो चाहे तेज रोशनी से चुंधियाया,
पर परदे के पीछे मिलेगी काली छाया,
दिल की गहराई ,कोई नाप ना पाया;
आखिर इसकी गहराई में,क्या क्या छिपा
कोई जान ना पाया,

हर इंसान है यहां कमाल के अभिनेता
किसी के जीवन के गहराई कोई समझ न पाया
जिस पर गुजरी वो जाने
घाव की टीस घायल ही जाने
चेहरे की हंसी को सच्चाई समझ लेते है
दिल के गहरे अंधेरे कुएं में झांके कौन,?

आओ करे एक प्रयास, पर भर बैठो मेरे साथ
सोचे कुछ लोगो के बारे में आज
समझे उनके दिल के अंदरूनी अहसास
कितनी चोट खाई होगी जीवन में
जिससे आई होगी परछाई चेहरे पे

चलो करे बात नारी की
डोलती रहती है परिवार की खुशी के लिए
आंखो में अश्रु, होठों पर मुस्कान
मन के गहरे कुएं में डुबोए अनगिनत अरमान
ढूंढती रहती है अपनी पहचान

परिवार का स्तंभ, पिता के बारे आओ सोचे
दिल की गहराई में दफना अपने सपने
परिवार की खुशी के लिए दिन रात पिसते
मां की ममता की बाते है सब करते
पिता के त्याग की गहराई को समझे ना कोई

सिग्नल पर घूमते उस किन्नर की व्यथा
वो कचरा बिनने वाले बच्चो की गाथा
परिवार का पेट भरने के लिए
देह व्यापार करने वाली उस मां की दशा
सोचो कितने घाव सहे होंगे, कितनी होती होगी पीड़ा
जब दुत्कारते होंगे सभी
जब देखता होगा जमाना हिकारत से
कितना अंधकार छुपा होगा दिल के गहन कुएं में

आओ करे महसूस उन बूढ़े मां बाप के दिल की पीड़ा
जिनकी खबर न ली, बच्चो ने अकेला छोड़ा
कोई समझ नही पाया उनके टूटे ख्वाबों को,
कोई सुन ना पाया उनके उदगारों को
खो गए है मानो जिंदगी के अंधेरों में

किस किस की बात करे,
किस किस के दिल में झांके यहां
कोई अछूता नही है ,सीने में नासूर छुपाए है हजार
टूटे सपनो के गहन जंगल में सब है डोलते

अनुमान ना लगा पाएंगे
घाव इतनी गहराई तक लगे कैसे;
छोटे से दिल में चोंट इतनी गहरी क्यों
इतने पर भी दिल से आह तक ना निकालते
सब कुछ दिल में छिपा घाव गहरा होने पर भी ,
सामने टीस ना उभरने देते

ये तो कमाल है इंसानी फितरत का
कैसे भी हो परिस्थिति,
दिल के गहरे राज किसी को बताते नही
डूबते रहेंगे गमों के समंदर में
अपने दिल के घाव किसीको दिखाते नही
घुटते रहते है मन ही मन,
किसी को दरवाजा खटखटाने देते नही

खुद पर रख विश्वास

May 22, 2021

आज के शब्द के दो अलग अंदाज़,
पर मतलब है वही रख खुद पर विश्वास
Have faith in your beliefs

रिश्ते हो या हो देश का विकास,
धर्म की बात हो या कोई व्यापार,
सदियों से धरती पर है इसका वास
जिस पर टिका है यह जहान वो है विश्वास
यकीन न हो तो छान मारो सारा इतिहास

इस संसार की बुनियाद है ये,
हर रिश्ते की आस है ये
जब वास करता है मन में,
सब कुछ खिल जाता है जैसे पल में

संसार का हर प्राणी रखता है दूसरे से
ये वो प्यास है, रोम रोम में बसी आस है
यह है वो शक्ति जो देती है हौसला
जिसके पास है ये वो कभी नही हारता

हर प्राणी को है विश्वास ,
कोई तो है जो रखेगा उसका ध्यान
कैसी भी विपदा आये, लेगा उसका हाथ थाम

भगवान पर अटूट श्रद्धा देती है हमको हिम्मत
कैसी भी मुश्किल आये उसका वरद है हम पर
माँ बाप का है आशीर्वाद हमेशा, बच्चो को मालूम है
कभी ने एक दूसरे को गिरने देंगे , परिवार को एहसास है
सुख दुःख के है साथी, पति पत्नी का है ये वादा
नेता रखेगा ध्यान जनता का,सरकार रखेगी देश का
दोस्त निभाएंगे दोस्ती का फ़र्ज़ ,
कोई न देगा किसीको धोखा
सैनिक करेंगे देश की रखवाली

डाक्टर करेंगे हर मरीज का इलाज
पुलिस करेगी हमारी रक्षा, सबको है अंदाजा
बच्चे बुढ़ापे में रखेंगे ध्यान
इसी उम्मीद के साथ माँ बाप है जीते
हर कोई करेगा अपना काम ईमानदारी से
सुखचैन अमन प्यार भरा होगा यह जहाँ
जहाँ रहेंगे सब मिल जुल प्यार से
इसी विश्वास के सहारे हम है जीते
दिन रात सपने पुरे होने के ख्वाब है देखते

पर ऐसा होता नहीं अक्सर दिल टूट जाता है
जिस पर हो विश्वास वो दगा दे जाता है
कहीं ख्वाब टूटने से मचता है हाहाकार
कोई छोड़ता है मझदार
कोई देता है दोस्ती और प्यार के नाम पर धोखा,
तो कोइ लुटने का छोड़ता नही मौका

कोई डूब अपने स्वार्थ में भूलता दुनियादारी
कोई पैसे के लालच में करता है देश के साथ गद्दारी
तो कोई खेले मासूम जिन्दगियो से करके कालाबाजारी
एक दूसरे का हराने पर लगी है होड़
देखो कौन ले जायेगा यह बाजी

कैसा समय है आया
भगवान की श्रद्धा का भी मोल लगाया
अंध विश्वास और अपाहिज धारणाओं
ने साम्राज्य फैलाया
कितने मजबूर और लाचार हो गए है
दूसरे के सहारे को तरसते है हम

किसी का यकीन तोड़ने में वक्त नहीं लगता
खुदगर्ज दूसरों को गिराने का कोई मौका नहीं छोड़ता
हर कोई लगा है यहाँ एक दूसरे को मिटाने को
दूसरे को हटा खुद की नैया पार लगाने को

कहते है विश्वास पर दुनिया है कायम
मन में यकीन हो तो कुछ नही नामुमकिन
जब साथ कुछ नही जायेगा जानते है सब
तो फिर क्यों चंद सिक्को के लिए
आत्मा बेच देते है हम
खुद को उठाने के लिए दूसरी को गिरा देते है लोग

क्यों नही बदलते जड़ों में दबी मान्यताओं को
क्यों निर्भर रहते दूसरों पर
क्यूं नही करते खुद का हौसला बुलंद
क्यूं नही करते खुद पर भरोसा

हम चाहे तो दुनिया बदल सकते है
दृढ़ हो आत्मबल तो कर सकते है सामना
समाज की कुरीतियों का, देश के गद्दारों का
मानवता के दुश्मनों का,अरजकताओ का
जरूरत है तो सिर्फ आत्मशक्ति बढ़ाने की
खुद की योग्यताओ पर यकीन करने की
मन में उम्मीद का पौधा लगाने की
जो बढ़ने के बाद सिर्फ दे मीठे फल विश्वास के,
जो कर दे सपने साकार , देखे जो खुली आंखों से


बस करो खुद पर यकीन
क्योंकि

गर खुद पर है यकीन, तू दुनिया जीत सकता है
यह धरती क्या चाँद तारे भी छू सकता है
क्यों डरता है किसी से, जब कर लिया सागर को पार
क्यों है घबराता जब छू लिया है आसमान

कर कुछ ऐसा, तुझे न हो जरुरत दुनिया की
बल्कि तू बन जाए जरुरत दुनिया की
कुछ नहीं है नामुमकिन तेरे लिए
बना खुद का रास्ता चट्टानों के बीच
कर खुद पर यकीन

ना कर समझौता कभी , ना रख छोटे अरमान
विश्वास के पंख है पास तेरे,
छू ले उछल कर वो आसमान
कर ना उम्मीद किसी से ना रख किसी से आस
ना कर किसी दूसरे पर भरोसा न फैला हाथ
कर खुद पर यकीन

व्यर्थ न कर समय को , खुद को न समझ असमर्थ
जब तक है तेरा यकीन, तेरा विश्वास है तेरे पास
आये लाख तूफान तू कर सामना सीना तान
ना रुक किसी मोड़ पर, ना मान किसी से हार
कर खुद पर यकीन

न झुकेगा कभी, न हारेगा कभी
कितनी भी मुश्किल आये
तो उठ खड़ा होगा तू रख विश्वास खुद पर
है यही रास्ता, नहीं रहेंगे तेरे सपने अधूरे
मिलेगी मंजिल तुझे, होंगे सपने पुरे
बस हिम्मत न हार, कर खुद पर यकीन

Bar

May 15, 2021

A fun post – you may smile if you like it😂

I was barred from entering the bar
(where sex and religion had no bar )
As I was eating a chocolate bar
which was not allowed inside the bar,
Barring liquor, only cold drinks were allowed inside the bar
I had to stand behind the wooden bar to first finish my chocolate bar
Else I would be taken to the court bar
and may be put behind the bars
I don’t know whether
They will give me a soap bar
In the barred cell.
My going behind the bar
May change the bar graph of court cases
And the court may celebrate the rise in their graph as they want to raise the bar a little higher each time a new case is there
I Did not want to be a barred person so I stood out of the bar and finished my chocho bar.
But then I decided to go to the barbar shop first as I had to attend the bar-becue dinner arranged by my bar rister
As I lifted the bar of the door, the bartender barged out bar efoot and welcomed me in
I thanked my stars and
promised to be careful lest I am debarred from my social group bar bar

P.S
You may add more lines
As there is no bar to add more lines
You may even smile
a little after reading this
As that will increase the bar line
of your well being

Bar- कठघरा/ रोकना/ प्रतिबंद लगाना मना करना/ डंडा/ अदालत/बाधा

May 15, 2021

यहॉ न जाओ वहां न जाओ
यह न पहनो, यह न खाओ
कुछ सामाजिक, कुछ पारिवारिक
कुछ खुद अपनी, कुछ परायी
हजारो बंदिशे है सब पर

ये धर्म के खिलाफ है तो मत करो
वो तुम्हारे रुतबे के लायक नहीं
वो तुम्हारे ओहदे के बराबर नहीं
हमारी समाज में ऐसा होता नहीं ,
इसलिए तुम ऐसा कर सकते नहीं

आज भी कितनी लड़कियों पर है पढ़ने की पाबन्दी
बालपन में घर सँभालने की जिम्मेदारियां कई
औरत की जिंदगी में भी लाखो बंदिशे खड़ी
No Gender डिस्क्रिमिनेशन कहने पर भी
औरत और पुरुष के हक़ में है भेदभाव

इज़्ज़त से सर उठा कर जीने का हक़ नहीं सबको
आज़ादी से अपनी मनमानी करने की इजाजत नहीं सबको
आज भी अपनी आवाज उठने पर होता है चर्चा
अदालत के कटघरे में खड़ा कर मिलती है सजा

स्वतंत्र गणतंत्र के नागरिको नहीं है हक़ एक समान
race, reilgion No Bar का नियम होते हुए भी
सबसे ज्यादा अवरोध है इसमें

क्यों सबको समान हक़ मिलता नहीं?
क्यों मासूमो को इज़्ज़त से जीने की राह नहीं?
क्यों लगाती ये दुनिया ,ये समाज हजारो बदिशे ?
क्यों रोकती है सिर ऊंचा करके चलने को ?

क्यों रोड़े है हर कदम पर?
क्यों सच बोलने पर मिलती है सजा?
क्यों झूठे, मक्कार अपराधी लेते है जीने का मजा?

रोकना है तो रोको उनको, करे दवाई की कालाबाजारी
क्यों नहीं रोकते उन्हें जो ऑक्सीजन के नाम पर लूट मचाते
मना करो उन्हें धर्म के नाम पर है लुटते
डालो बाधा उनकी राहों में को बुजुर्गों की सेवा करने से हिचकिचाते

प्रतिबंध लगाओ उन वहशियों की कामुक भावनाओं को
जो किसी भी नारी को देख अपनी लार टपकाते
करो कटघरे में खड़ा उनको
जो मासूमो का बलात्कार कर उनका जीवन नरक बनाये

बंदिश लगाओ मन की उन लालसाओं को
जिनको पूरा करने के लिए करने पड़ते अवैधनिक काम कई
रोक सको तो रोको अपनी नकारात्मक सोच को
जो सफलता ही राह में रोड़े अटकाए

डालो सलाखों के पीछे भ्रष्टाचारियों को
कानून का जो करे अपमान उन्हें लगाओ डंडा
प्राकृतिक नेमतों का जो करे अपमान
उन पर लगाओ बंदिशों का ताला

भ्रूण हत्या पर लगा दो अंकुश
यह है असली बंदिश
मानवता की करे न जो इज़्ज़त
उसको जीने का हक़ नहीं

मदिरा पान में कोई बुराई नही
मयखाने में जाने में नुकसान नहीं
शराब पी कर जो भूले अपनी सीमाओं को
उनको सजा देने में कोई हर्ज नहीं

बंदिश या प्रतिबंध नहीं है, कोई जहरीला निवाला
बुराइयों पर जो रोक लगाए, वो है है ताला
जिंदगी के हर मोड़ पर आती है कई बाधा
जिसको करके पार हमे है आगे निकलना

My Family – My Hood

May 9, 2021

Right from my childhood, I had this dream
Of wearing a colorful jacket with a hood
On my head that will rest like a crown
Protect me from the heat and cold statehood

My safety hood will hide my face
When I tie it with a lace
My riding companion on my bike all around
Guarding my head from hitting the ground

On mother’s day my daughter gifted me a hood
To honor my motherhood
Should I don it like my priced trophy
In the sultry heat of Bombay
but It will remain in my cupboard
there is every likelihood

My hood and my family both are similar
I say they are synonym of each other
You will wonder how it can?
I will tell you what I mean

My family is my safe haven
Caring, protective and gives affection
Guards me from external vibes that are cold
Each member embraces me and gives warmth
My hood does the same
Shields me from the cold and gives me warmth
Now you know what I mean

My family protects me from forces that causes harm
My hood stops the winds and the storm
In its thick folds I can hide my face
In the lap of my family I can hide and find peace
You can understand what I mean

It’s comfort ,I seek from hood
It’s comfort I get from my family
Family or hood both are buddy hoods
Forming a bond of together hood

प्यार का Hood

May 7, 2021

हर गुरुवार की तरह रात करवटे बदलती रही
जरा सी आंख लगने पर fridayword
के सपने देखती रही
सुबह होते ही कांपते हाथो से फोन उठाया
दिल में उत्सुकता, चेहरे पर बेचैनी लिए
Facebook को क्लिक किया
Dywt के पेज पर hood लिखा देख कुछ समझ नहीं आया
यह कैसा शब्द है, इसपर भी भला कुछ लिख सकते है
सोच सोच दिमाग चरमराया
हुड तो sweatshirt की टोपी होती है
क्या आज इतने सिंपल word टोपी पर लिखना है?
क्या मैडम प्रभा किशोर इतना आसान शब्द देंगी?
क्या वो इतने सस्ते में सबको छोड़ देंगी?
नही! यह हो नही सकता
वो जानती है group के मेंबर्स है बेमिसाल
Simple word में भी दिखा देंगे अपना कमाल
बस Googlel में Hood को सर्च किया
ऊपर नीचे पूरे पेज को रट लिया
टोपी,पगड़ी, ओढ़नी, कंटोप
ढकना, छुपाना छतरी, हेलमेट
मतलब है इसके अनेक

समझ आ गया आसान नहीं है यह शब्द
सोचते सोचते हो जाएंगे सब तंग
गर चाहिए सबका थम्स अप
तो अपने विचारो को पहनाओ ऐसा हुड
जज Kavita Jhingan भी रह जाए दंग

चलो छोड़ो, बनाए अपना मूड
अब सोचे जिसपर करने है अपने विचार
क्या है ये हुड?

दादाजी के जमाने में पगड़ी उनकी शान थी
पिताजी को टोपी ना पहनने पर पड़ती डांट थी
जरूरी थी घर की औरतों के सिर पर ओढ़नी
क्योंकि यही तो थी नारी की लज्जा की निशानी
मै खुद भी घूमी हुं सिर पर लिए ओढ़नी कई साल
मजाल है सरक जाए घूंघट, दिख जाए बाल
घर के बुजुर्गो के सामने किए सब काम
लिए सिर पर पल्ला
आज किसी को सिर ढकने को बोलो
तो मच जाए हल्ला
पगड़ी थी परिवार की इज्जत की आन
आज भी पहनो न पहनो फिर भी
लोग कहते है रखना पगड़ी की लाज

Hood सिर्फ पहनावा ही नही करता है काम भी
कभी छतरी बन बचाता बरसात या धूप से
तो कभी हेलमेट बन करता रक्षा आकस्मिकअवघात से
कभी बन कनटोप बचाए हवा से,
दे गर्मी बचाए सर्दी से
तो कभी hat बन दिलाए रुतबा समाज से

Hood किसी से कम नहीं,
अपने अंदर छुपाए राज कई
कर परदे का काम , छुपाए शारारिक ऐब कभी
तो भावनाओं को छुपा बचाए रिश्ते कई

हैरान हुं यह सोच कर
एक छोटे से शब्द के कितने गूढ़ है मायने
जैसी परिस्थिति वैसे काम इसके

आओ आप हम भी पहन ले hood प्यार का
भूल आपसी झगड़े, रिश्तों की करे रक्षा
दफना दे अपने बैर भाव को भीतर
ढक दे उसको मोहब्बत की मिट्टी डाल
तोड़ ना पाए कोई परिवार की एकता
गर बन सब हेलमेट, करे सामना दुश्मन का

Puppets

May 5, 2021

My thoughts on Puppets

Puppet
We are the women of modern era.
Strong, independent, self sufficient, we can write our own destiny, we can do whatever we want we can move mountains with our determination.

This sounds so encouraging and heartenin?

But is it really true?
In many cases a woman’s life strings are more often than not are pulled by either her parents or husband and later on by children.
Like a Puppet she dances to the dictates of her parents ( how to move, where to go, when to come home, whom to talk, how to behave)
After marriage her strings are publicly handed over to her husband who then pulls them as per his wish( what to wear, what to cook and eat , what he wants, satisfy his needs as per his wish only, kill her own desires and cater to his all whims and fancies, be at his back and call) .
Gradually the children also starts pulling her strings( satisfy their needs, do their work, forget her own dreams to realise their dreams, be available to them 24×7).
In between like a Puppet she keeps oscillating between her inlaws, societal pressures and her family.

Her parents/ husband/ children like
puppeteers make use of gestures, words to control her movements of body, head, limbs, even her feelings and emotions .

Her life is peaceful if she loves her strings and obeys the dictates of string pullers
Yes , I admit in few cases the situations may be different but researches have shown that in majority of cultures the status of a woman all over in this planet are still the same.

Wake up women.
Stop being a puppet in the hands of others.

जलाओ ऐसा अलाव

May 1, 2021

जीवन एक भट्टी है ,जिसकी अग्नि में हम दहक रहे है
पल पल जल कर, तप रहे है, निखर रहे है

अग्नि से जीवन है, अग्नि से मृत्यु
अग्नि आस है अग्नि विश्वास है
तीव्र, प्रचंड, अखंड, पावक
अग्नि की भी अपनी कहानी है

कहीं करती उजाला तो कही अंधकार है
कभी करती नाश तो कभी करती निर्माण है

इसके है रूप अनेक
कभी जल चूल्हे में , करती शांत पेट की ज्वाला
तो कभी कुम्हार की भट्टी में जल
फूंकती मिट्टी में जान
कारखाने में ,बन चिमनी का धुआं
देती संदेसा प्रगति का
कभी हवनकुंड की पावन ज्वाला
में बनती पवित्रता की मूरत
तो कभी विवाहमंडप के अग्नि कुंड
में करती दो दिलो का संगम
ले रूप अलाव का भीषण सर्दी से देती राहत
तो पैसे वालों के कमरे में बन fireplace
बढ़ाती उनकी शान

कभी जलती बाहर तो कभी जलती भीतर
बाहर की आग लाती उन्नति
देती गर्मी, रचती
नया इतिहास है
भीतर की आग जलाती रिश्ते,
लाती मन में दरार है
क्रोध की अग्नि भड़क, करती रिश्तो को खाक
और करती अलग अपनों को ,तोड़ देती परिवार

ना जलाओ अंदर ऐसा अलाव
जहां जले रिश्ते और प्यार।
इंसानियत और विश्वास

जलाना है तो जला दो
उसमें घृणा, नफरत, आपसी बैर,
हैवानगी, वहशीपन और अपनी जलन

करो कुछ ऐसा फैले प्यार की गर्मी
भड़के भाईचारे के शोले ,निकले मानवता की चिंगारी

Dreaming of a Fireplace

May 1, 2021

I’ve always had this dream
To have a fireplace inside my home
Glamorized in movies
and magazines have shown
Adron the mantel with antiques
and pictures
Of family and my own

With the snow falling softly outside
And the flames roaring inside
Feeling the softness of the kashmiri rug
and the warmth of the cup of tea
Listening to a soulful melody
Feeling much like a classy lady

Ofcourse posting the scene
on social media
It is with the intention to give
others an idea

The bright flames making
skin glow and warm
Creating an aura of selfless love of causing no harm
The burning embers teaching the
lesson of giving
Warmth to other
even if one has to Burn

I find myself drifting into a sleep
Jolting back to reality and
smiling at the dream

Do I need a fireplace
in a tropical place like mine?
when I can still sit by the
sunkissed balcony and dine

May be if I shift to cooler space
Then it would be a different case
And I will surely realise
my dream of having a fireplace

यादों का अग्निकुंड

April 30, 2021

आज का शब्द ने इस दहकती गर्मी का
पारा और बड़ा दिया
AC की ठंडक में बैठ fireplace के बारे
में सोचने को मजबूर कर दिया
माथे से छलकते पसीने को भूल
बचपन की सुनहरी यादों के
हसीन नगरी में ले गया
Fireplace पढ़ते ही
बचपन की यादों में जान सी आ गई
दिल में मस्ती और होठों पर मुस्कराहट आ गई
मानों कल की ही तो बात थी
वो सर्दी की सुबह, वो रजाई की गर्माहट
वो पिताजी की डांट सुन रोते रोते उठना
फिर भाग कर झट रसोई में जाना
और सबसे पहले मां के साथ अंगीठी के पास बैठना
या फिर रात को सोने से पहले रसोई में
चूल्हे के पास अपनी कोई चीज रख कर
अगले दिन सुबह के लिए अपनी जगह पहले से
सुरक्षित करना
वो बंबे/ हमाम ( देसी gyser) में लकड़ियां जलाकर
पानी गरम करना
और सिर्फ एक बाल्टी गरम पानी से नहाना
रात को कमरे में अंगीठी की आंच में हाथ सेकना, गरम गरम सेकी हुई मूंगफली खाना
कोयले की उड़ती हुई चिंगारी का तड़तड़ाना
और सपने देखना महलनुमा घरों और उनके
बड़े बड़े कमरों के fireplace या heaters के
वो सहेलियों के साथ सर्दी में ठिठुरते हुए घूमना
और रास्ते में गली के कोने में
जलते अलाव के पास खड़े हो घंटो बाते करना
वो भी क्या दिन थे,
चूल्हे से एकदम सीधी उतरी गरम रोटी पर घी का डल्ला, मां का प्यार और भाई बहन की छेड़ छाड़
एक दूसरे से छीन कर खाना,मिल जुल कर रहना
सब मानो समय की अग्नि की लपटों की
भेंट चढ़ गए
अब सिर्फ यादें ही तो बची है
आज घर में सपनो वाला
छोटा सा आधुनिक fireplace है
जिसमें से कोई चिंगारी नही निकलती
नहाने के लिए gyser में से निरंतर
निकलता गरम पानी है
कमरा गरम करने को रूम हीटर है
बस नही है तो वो मां के हाथो बनी चूल्हे की रोटी
डैडी का रात को अंगीठी में शकरकंद सेकना
वो भाई बहन से लड़ाई
वो एक साथ रजाई में बैठ कर बाते करना।
समय बदल गया
Modern gadgets ने जीवन आसान कर दिया
दुनियादारी और घर की जिम्मेदारियों ने
आपसी रिश्तों की गरमाहट से दूर कर दिया
पर आज के इस Fridayword ने
पुरानी यादों की चिंगारी को मानो फिर आग दे दी
और पूरा समा मानो
अग्निकुंड की गर्मी की तरह बदन को झुलझा सा गया