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Doubt

July 3, 2022

“Samar, I have a doubt that Bablu, our house servant steals money from our house. And also while buying groceries he may be buying less quantity and charging us more.
” Ruchi, this is very common tendency with house servants. Either you overlook these small incidents or remove him and manage the house by yourself. It’s your choice. Honestly we can not afford to loose him, so my advice is just let it go. 10 rupees here and there does not matter so much. Especially during this lock down period, we can neither find another servant nor risk calling any stranger to our house”.
Although Roma did not mention the topic again but she became a little more careful.
After few days , Ruchi realised that the 500 Rs note which her father in law had kept on his table under the diary was not there. She was sure that it was there till yesterday morning but now it was not there.
She had no doubt that Bablu had taken it since no one from outside had visited their house during this lock down period . But she knew that if she asks Bablu directly, he will not admit taking it, rather will sulk and may offer to leave the job .
She thought for some time and then called Bablu and told him,” Bablu, the 500 Rs note which was kept here is missing. I know you have not taken it, I do not doubt your integrity. I know you are very honest. But I think during daily dusting of the table, the note must have fallen down, or by mistake you or I may have put it somewhere else. It was there till yesterday morning so it can’t disappear in one day. No one came to our house nor anyone went out.”
” Bablu please search carefully under the bed, under all the papers even in papaji’s clothes.”
Bablu pretended to search and kept saying, he did not take it.
” Bhabhi, do you think I am a thief, are you suspecting that I have taken it? Bablu asked.
” No Bablu,i am not saying that you have taken but since it was there till yesterday, so it must have got misplaced some where. So please keep looking for it. It must be somewhere here only.”
Suddenly Bablu got up and went inside the washroom.
May be it was Roma’s intuition or she wanted to give time to Bablu, so she told him, ” Bablu I have to make a phone call. You please keep searching, we will surely find it”.
Roma had hardly reached her room that Bablu suddenly shouted, ” Bhabhi, I have found the note. See it was in between the newspaper. In the morning when I was cleaning the table, I had removed everything from the table and kept them under the table so the note must have slipped from the diary and got mixed up in the newspaper.” And he showed me the note which was crumpled and tucked in between the papers.
Roma was surprised at the audacity and boldness of Bablu. Because she knew that the note was kept neatly folded in the diary and there were no newspapers in the room in the morning.
She realised that since she was insisting and forcing Bablu to look for the note, he had become alert and that is why he went inside the bathroom to remove the note which he must have hidden in his clothes. And then he came out and placed it in between the newspapers. Else how would the note get crumpled?
There was no doubt in her mind that Bablu had stolen the note. He must have thought that no one will find out that the note was missing.
But since he realised that Roma is aware of the missing note, and ultimately everyone will doubt him and the blame will be on him only, so it would be better that he puts it back.

Roma could see that Bablu was feeling guilty as he was not able to look at Roma directly. He had sensed that Roma knew that it was he who had actually stolen the note.
Fear could be seen on his face as he was worried that Roma may complain to Samar about the note incident and he may be thrown out of the job so the whole day he was extra humble and over attentive towards everyone in the family.

But this incidence had taught Roma a lesson that without doubt people like Bablu cannot be trusted.

शक की आंधी

July 2, 2022

अरमानों के तिनकों से बना था आशियाना
विश्वास की छत, सपनों की दीवारें
उम्मीदों की खिड़कियां,प्यार का दरवाजे
खुशियों की जगमगाती रोशनी
चारो तरफ फैली हंसी की किलकारियां
ना कोई झगड़ा, ना कोई खींचातानी
स्वर्ग से सुंदर था समां
प्यार ही प्यार पनपता था जहां

शक की ऐसी आंधी चली
तिनका तिनका बिखरने लगा घर का कोना कोना
विश्वास हवा के साथ उड़ने लगा
संदेह ने डाला अपना डेरा
छोटी छोटी बातो पर होने लगी तकरार
दिल के रिश्ते होने लगे तार तार
उजड़ गई बगिया, टूट गया सपनो का संसार

शक मत करो मेरे प्यार पर, वो कहती रही
चाहो ले लो अग्नि परीक्षा
मेरी मोहब्बत बहुत है गहरी
सिर्फ तुमसे ही किया है प्यार
यकीन करो तुम्हारे बिना कोई नहीं दूजा
पर संशय के कीड़ों की कुलबुलाहट के आगे
चला ना जोर किसी का

प्यार का झूला झूलने वाले
एक दूसरे से कतराने लगे
जिंदगी भर साथ निभाने का वादा करने वाले
शक की छत्र छाया में अलग होने लगे

अकेलेपन और अपमान से बिलखती
हार गई वो आखिरकार
एक अंधेरी रात, किस्मत के आगे सिर झुका
लिख कर एक पर्ची ,तड़पती चली गई वो उस पार
हर पल जीती रही तुम्हे अपना बनाने को
हर कोशिश करती रही रिश्ते बनाने को
बेबुनियाद शक ही काफी था
जिंदगी उजाड़ने को।

आत्म संदेह -Self Doubt

July 1, 2022

“पापा, मैं दुबारा एग्जाम नही दे सकती। मुझे डर लग रहा है मुझे वापिस अच्छा रैंक नही मिलेगा। मेरा एडमिशन अच्छे कालेज में नही होगा। मैं शायद इतनी होशियार या मेहनती नहीं हूं “
श्रुति ने अपने पापा को व्हाट्सएप पर मैसेज किया था, जिसको पढ़ कर वो बहुत परेशान हो गए थे।

“रोमा , मैं श्रुति के लिए बहुत फिक्रमंद हूं, वो हिम्मत हार चुकी है, मैं जानता हूं उसमें क्षमता है, वो मेहनती है, और वो कर सकती है, अभी तक कॉलेज में हमेशा वो फर्स्ट आई है, सिर्फ एक बार की असफलता ने उसका हौसला पस्त कर दिया है। उसने अपने आप को आत्म संदेह की चादर से ढक लिया है। ” अमन ने चिंतित होकर अपनी पत्नी रोमासे अपने दिल का डर बताया।
” हां अमन मैं जानती हूं, श्रुति का बचपन से सपना था एक डॉक्टर बनने का, पर इस बार के All India selection exam में उसका rank नही आया इसीलिए वो अपनी काबिलियत पर शक करने लगी है।उसको लगने लगा है कि वो एक आम विद्यार्थी है। उसको बहुत उम्मीद थी कि उसको अच्छा rank मिल जाएगा ,वो ये भी जानती है कि हम लोग donation देकर उसका दाखिला नहीं करा सकते है। इसीलिए उसको बहुत निराशा हो गई है।”
“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा इसके मन से ये आत्म संदेह की भावना को कैसे निकालू और उसका आत्मविश्वास वापिस लाऊं “।
अचानक अमन को कुछ याद आया, उसने lap top चालू कर सुधा चंद्रन की आत्मकथा का लिंक श्रुति को भेजा और व्हाट्सएप पर एक मैसेज किया,” श्रुति तुम्हारी जिंदगी को बनाना या उसको बिगड़ना तुम्हारे हाथ में है, सिर्फ ये लिंक क्लिक करके एक बार पढ़ लो, मेरी तुमसे यही प्रार्थना है”।
अगले दिन श्रुति अपने कमरे से बाहर आकर पापा को बोली,” पापा क्या ये कहानी सच्ची है? क्या वाकई सुधा चंद्रन का पैर कट गया था, क्या वाकई उसने नकली पैर लगा कर वापस डांस करना शुरू किया था,? “
अमन ने बहुत प्यार से उसको बिठाया और बताया ” बेटा ये बहुत प्रेरणादायक सच्ची कहानी है, अगर तुम चाहो तो बॉलीवुड मूवी नाच मयूरी नाच देख सकती हो, वो इसी कहानी का फिल्मी रूपांतरण है” अगर वो चाहती तो एक्सीडेंट के बाद घर पर बैठ सकती थी। पर उसने ये नही किया। अपनी क्षमता पर शक ना करके अपनी कमजोरी को अपना आत्मबल बनाया और आज वो एक मिसाल है पूरी दुनिया के सामने। तुम तो एक बार अच्छा रैंक न लाने से आत्म ग्लानि से भर गई हो। अपनी capabilities पर doubt करने लगी हो।”
“बेटा समय समय पर हम सब ऐसे वक्त से गुजरते हैं जब हम अपनी क्षमताओं पर शक करने लगते हैं-
हमे चाहिए कि हम इस आत्म-संदेह को तोड़ना शुरू करें, इससे पहले की आत्म-संदेह फिर से अपने पर हावी होने लगे, हमे तुरंत अपने पर नियंत्रण करना चाहिए और अपने आप से इन शब्दों को जोर से दोहराना चाहिए “मैं फिर से अपने आप पर शक कर रही हूँ । मुझे अपने आत्म संदेह को अपनी शक्ति बनाना है।
जैसे ही हम मानते हैं कि शक खुद के ऊपर हावी हो रहा है, हम उसके प्रति सजग हो जाते हैं और इससे पहले की शक हमे पूरी तरह निराश कर दे हमे इसके प्रति कुछ कदम उठाने को तत्पर हो जाना चाहिए।
बेटा अपने संदेह को साहस और दृढ संकल्प में परिवर्तित कर और अपने आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करो।
जब भी हम किसी काम को करने से पहले ही दुविधा में घिर जाते हैं, तो हम उस काम को कहीं ज्यादा मुश्किल बना देते हैं। कुछ भी उतना कठिन नहीं होता जितना वो प्रतीत होगा है।संदेह से अपने आप को अलग करो और संदेह को अपने ऊपर हावी ना होने दो।”

ये सब सुन कर श्रुति में एक अजब सी हिम्मत आ गई। वो पापा मम्मी दोनो के पास आकर बोली” बस ऐसे ही मेरा हौसला बढ़ाते रहो। जब भी मैं आत्म संदेह से ढक जाऊ या मुझे मेरी सफलता पर शक होने लगे तो बस मेरा हाथ थाम लेना और मेरी हिम्मत टूटने मत देना।”
Thankyou so much मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास वापिस लाने के लिए। अब देखो मैं आपको दुगनी मेहनत करके दिखाती हूं”

कुछ महीने बाद जब All India competition का नतीजा आया तो श्रुति का नाम top 25 students में था।
उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, क्योंकि उसने अपनी क्षमता के शक को अपने ऊपर हावी न होने दिया था बल्कि अपने आत्म संशय को अपनी ताकत बना लिया था।

मैं गवाह हूं

June 26, 2022

बोल सकते हैं पर बोलते नही
देख सकते है पर देखते नहीं
महसूस करते है पर जताते नहीं
कोई बोले या ना बोले,कोई माने ना माने
मैं भगवान को हाजिर नाजिर मान
देना चाहती हूं अपनी गवाही

हां मैं गवाह हूं
सूरज की रोशनी की, चांद की शीतल चांदनी की
फूलो की खुशबू की पंछीयों की चहचहाट की
कलकल बहती झरनों की,नदी के पावन जल की
सागर की लहरों की, खेत खलियान की
भगवान की दी हुई हर नेमत की

हां मैं गवाह हूं
बच्चो की निर्मल किलकारियों की
भारत की संस्कृति और संस्कारो की
नारी के त्याग और बलिदान की
भाई बहन के प्यार की
मां बाप के दुलार की
बुढ़ापे में बच्चों के अलगाव की

हां मैं गवाह हूं
आपसी रिश्तों की गर्माहट की
झूठे अहम के कारण टूटते रिश्तों की
रिश्तों में आई दरारों की, आपसी झगड़ो की
एक दूसरे को नुकसान पहुंचाते जज्बातों की

हां मैं गवाह हूं
राजनीति को मोहरेबाजी की
समाज मैं फैली अराजकता की
असहाय, लाचारों की बेबसी की
मासूम अबलाओ पर अत्याचार की
सत्ता के नाम पर भ्रटाचार की

हां मैं गवाह हूं
धर्म के नाम पर ढकोसलों की
जाति के नाम पर जिंदा जलाए जाने की
देशभक्ति की आड़ में देश को तोड़ते द्रोहियो की
समाज सुधारकों के पाखंड की

हां मैं गवाह हूं
जन्म की, मौत की
जिंदगी के उतार चढ़ाव की
सुख की घड़ियों की , दुख के कांटो की
संसार के इस काल चक्र की
ईश्वर के अनगिनत चमत्कार की

आज सरेआम, मानती हूं अपनी गलती
आजतक ईश्वर के तोहफों की कदर ना मैने जानी
देती रही बुराई का साथ
शपथ खाकर करती हूं ये वादा
कुदरत की इस अथाह संपति का रखूंगी हमेशा मान
पूरी वफादारी से सच्चाई से रखूंगी नाता
अनैतिक काम ना करूंगी ना करने वालो का दूंगी साथ

आप भी सुन लो अपनी अंतरात्मा की आवाज
दे अगर आपका दिल गवाही ,
तोड़ दो अपनी चुप्पी
सुधार लो अपनी गलती,
कर लो ये निश्चय,
संभाल कर रखोगे ये ईश्वरीय दौलत
अन्याय का ना थामोगे हाथ

प्यार की गवाही

June 25, 2022

“भगवान गवाह है, मेरा मन तुम सब को छोड़ कर जाने को नही कर रहा है। तुम एक बार बोल दो रुचि मत जाओ तो मैं अपना प्रोग्राम कैंसल कर दूंगी” रुचि ने बहुत उदास मन से सागर को कहा।
शादी की 25 साल की जिंदगी में ये पहली बार था जब रुचि अपने परिवार को छोड़ कर घूमने जा रही थी।
“मम्मा, जिद ना को, आपको भी हक है अपनी जिंदगी जीने का, आपने आधी जिंदगी परिवार पर न्योछावर कर दी है। और कौनसा आप बहुत दिनो के लिए जा रही हो। दो दिन में तो वापिस आ जाओगी। हम लोग घर संभाल लेंगे”। रिया ने अपनी मम्मी का उत्साह बढ़ाया।
समर ने भी बहुत प्यार से रुचि की समझाया,” जाओ घूम कर आओ। मेरे ऑफिस की छुट्टी है 2 दिन। वीकेंड होने के कारण रिया का कॉलेज भी नही हैं, हम लोग सब संभाल लेंगे।”
” पर मेरी आत्मा गवाही नहीं दे रही, मैं मजे करु और तुम लोग घर में अकेले रहो” रुचि ने धीरे से कहा।
सच बात तो ये थी, रुचि दुविधा में थी, एक तरफ दोस्तो के साथ अलीबाग जाने का मौका, दूसरी तरफ घर की जिम्मेदारियां और परिवार का मोह।
समर ने वापिस बहुत शांति से जवाब दिया, ” तुम्हे जाना है तो जाओ, नही जाना तो घर में घुसी रहो। जब मौका मिल रहा है तो क्यों नही जा रही हो। तुम्हे क्या विश्वास नहीं है कि हम घर संभाल लेंगे। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, 2 दिन के बाद घर बिखरा हुआ मिलेगा, हो सकता है तुम्हारा किचन इतना साफ सुथरा नही होगा, थोड़ा खाना वेस्ट होगा, पर तुम दो दिन तो अपने दोस्तो के साथ खूबसूरत यादें सहेज सकोगी। आकर वापिस अपना घर परिवार संभाल लेना”।
रुचि ने उदास मन से सबको bye बोला और नीचे खड़ी मिनी बस में बैठ गई। वैसे उसको बहुत excitement भी था। पहली बार जा रही थी परिवार को छोड़ कर
इतने में whatsapp पर परिवार के ग्रुप पर समर का मैसेज आया, ” जा रुचि, जी ले अपनी जिंदगी ❤️,।
रिया ने भी मैसेज किया, ” मम्मा enjoy करो। बीच पर जाओगी तो साड़ी पहन कर मत जाना, 3/4th टाइट्स रखी है आपके बैग में वो पहनना।”

दो दिन के बाद जब रुचि वापिस घर आई, तो एक अजब सी ही चमक उसके चेहरे पर थी। हालांकि घर में घुसते हुए उसको थोड़ी घबराहट हो रही थी, कैसे सबने manage किया होगा उसके बिना।
घर में घुसते ही एक बहुत बड़े welcome home के बैनर ने उसका स्वागत किया।
सबको वो ऐसे गले मिली मानो बरसो के बाद मिल रही थी।
सोफे पर बैठते ही उसने कहा, ” मैने तुम सब को बहुत miss किया। हर वक्त तुम्हारी ही याद आती थी”
“रुचि झूठ मत बोलो, फेसबुक गवाह है कि तुमने कितना मजा किया, तुम्हारे दोस्तो की फोटोज में तुम कितनी खुश नजर आ रही हो, “
फिर धीरे से समर ने कहा,” वैसे 3/4टाइट्स और tshirt में बहुत smart लग रही थी। बिल्कुल अपने हनीमून वाले दिनों जैसे, यार ऐसे ही कपड़े पहना करो।”
रिया ने भी रुचि के गले लग कर कहा, ” मम्मा मैं बहुत खुश हूं कि आप अपने दोस्तों के साथ मजे कर के आई। सच बताऊं तो मैने आपको बहुत miss किया “
” रिया झूठ मत बोलो, मेरा फोन और व्हाट्सएप भी गवाह है, तुम लोगो का एक मिस कॉल भी नही है, ना ही एक भी मैसेज”।
” चलो रुचि, एक बढ़िया गरमागरम चाय बना दो, दो दिन से तरस गया हूं तुम्हारे हाथो की चाय पीने को” समर ने बहुत प्यार से बोला
” मम्मा देख लो घर कितना साफ सुथरा और जमा कर रखा है। ये इस बात की गवाही दे रहे है कि हम लोग अपनी जिम्मेदारी संभाल सकते है” रिया पीछे से चिल्लाई।
सब काम निपट जाने के बाद रुचि जब अपने कमरे में आई तो समर ने उसको अपने बाहुपाश में लेकर बोला,” रुचि सच बताऊं तुम्हारी बहुत याद आई। आदत हो गई है तुम्हारी”
” समर झूठ मत बोलो, एक भी फोन नहीं किया तुमने। तुमने मुझे कोई याद नहीं किया।”
समर ने बहुत फिल्मी अंदाज में गाना शुरू किया,” गवाह है, चांद तारे गवाह है, ओ मेरी रुचि”
और फिर धीरे से एक चिट्ठी उसके हाथो में थमा दी,” हां मैने तुम फ़ोन नही किया, सिर्फ इसीलिए की हम दोनों चाहते थे कि तुम हमसे बात करके विचलित ना हो जाओ। और रही बात मेरे याद करने की तो ये चिट्ठी , इसमें लिखे एक एक अल्फाज गवाह है मैने तुम्हे कितना याद किया।”

Parent- Director

June 12, 2022

This is a story which my father had told me in my childhood days .
He used to tell me that parents are the best directors in their child’s life.They can guide the child to take the right direction or they can be responsible for the child going haywire. How the future generations will shape up depend on the present generation.
If you show your child the right direction, he and his children also will make a mark for themselves in their life.
This teaching of his is so inspiring and motivating that it has become my guide at every step of my life and gives a lesson which no book will teach me .

Now to the story

There were these two twin brothers Vijay and Vinay of an alcoholic father and a simple illiterate woman.
Naturally the parents loved the twins but the responsibility of bringing them up was on the mother only as the father was busy in earning, gambling, and drinking.
Although the mother tried her best to inculcate the right values in both the children, Vijay was becoming more interested in his father’s way of life. Easy money, flamboyant style, carefree life etc were more appealing to him than studying and making a career. Gradually he started following his father’s footsteps . His father was least interested in the future of his children so he did not stop Vijay from indulging in all bad habits and ruining his life. Rather he was very happy that Vijay had become his ardent fan . He started teaching him all the tricks of gambling and encouraged him to become alcoholic.
A time came when Vijay had become more alcoholic than his father, he started loosing all his money which he managed to earn by doing menial jobs, in gambling and was always in debts.
Once Vijay was caught in a theft case and was even put behind the bars for few months
Slowly the father started realising his mistakes but it had become too late to change the lifestyle and habits of Vijay .He was regretting his style of upbringing Vijay because he could see that Vijay was sliding down the hill .
Whereas Vinay under his mother’s directions and guidance completed his education and started his own consultancy firm.
As the time progressed, Vinay attained success in life. He had all the possible comforts of life , stylish clothes, happy family life, money in the bank, status in the society.
Once in a family function when both the brothers were together, the difference in their life style was easily visible to everyone. Vijay in his disshelved clothes, clumsy appearance, wobbly body due to constant intake of cheap alcohol had become laughing stock of all the relatives.
Vinay was example of good manners whereas Vijay was rude to the point of being abusive to all .
When some one pointed out the difference between them, the father admitted with tears in his eyes that as a father he could not give correct directions to Vijay.
Whereas his illiterate wife had fulfilled her duty of a parent -director with full perfection and shown the right path to Vinay.
He further admitted that as a father he had failed his duties. It was his responsibility as a director of his child’s future life to hold his hand and lead toward the right path.
He advised everyone present there that it is the duty and responsibility of parents to give proper guidance to their children.
For once he was all praises for his wife. He said,” I am proud of her, she like a good Director guided and corrected Vinay. She brought out the best in him . She should get the Best parent Director award and he deserves the worst Director award.”

Although this is the end of the story but I use it as the first primer of my
directorial role as a parent.
Whenever there is any issues with my children, I always think of my father and this story and try to mend my ways so as to become a good Director for them

बन खुद की निर्देशक

June 11, 2022

औरों की मर्जी से अब तक जीती आई
दूसरो के बनाए रास्तों पर चलती आई
कब तक चलेगी दूसरो के इशारों पर
जिएगी दूसरो के सहारे पर
उठ, खुद को पहचान, अपना आत्मविश्वास जगा
तू नही किसी से कम,
बन खुद की निर्देशक खुद की राहें बना

छोड़ दूसरो की उंगली पकड़ चलना
कातर नजरों से मदद के लिए तकना
तू है दुर्गा तू है काली
तू चाहे तो जीत ले दुनिया सारी
ठोकर खाकर संभलना सीख
गिर कर खुद उठना सीख
सहारे की आस ना कर
बन खुद की निर्देशक इस जहान को फतह कर

गया वो वक्त जीती थी घुट घुट कर।
चुप रहती सब कुछ सहती, रोती छुप छुप कर।।
तोड़ के रूढ़ियों की दीवार
अपने हक के लिए आवाज उठा
मार्ग दर्शक बन औरों को राह दिखा
आगे बढ़ कायम कर एक मिसाल
बन के एक निर्देशक,नए युग का कर निर्माण

मत समझ खुद को कमजोर
खुद की शर्तो पर जीना सीख
दूसरों के सपने पूरी करती आई
अपने सपनों में हकीकत का रंग भर
तूने संवारी दुनिया सारी ,अब आई तेरी बारी
बन खुद की निर्देशक अपनी जिंदगी को निखार

माना काट दिए थे तेरे पंख
दफन कर दी जीने की उमंग
अब तक परिवार के लिए जीती रही
अपने घायल पंखों को आंसुओ से धोती रही
गम ना कर, उन पर उम्मीद का मलहम लगा
अपने लिए समय निकाल
तेरी है जमीन, तेरा ही आसमान
बन खुद की निर्देशक ,ऊंची भर उड़ान

birthday/ जन्मदिन

June 5, 2022

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर मेरी छोटी सी रचना Friday word prompt जन्मदिन/ बर्थडे पर

पड़ोस में जन्मदिन की पार्टी के शोर से अचानक खुल गई मेरी आंख
कान लगा सुना तो संगीत के साथ कुछ खुसर फुसर की आई आवाज
दरवाजा खोल झांका तो आस पड़ोस के पेड़ पौधो
की चल रही थी मंत्रणा
पेशे खिदमत उनका वार्तालाप जो मैने चुपके से सुना

“इस दुनिया में जन्मदिन की है बहुत महिमा
इंसान हो या पालतू जानवर, जन्मदिन का जश्न मना, करते है सब जलसा
दुश्मन हो या दोस्त, देशभक्त या हो गद्दार
भ्रष्टाचारी या क्रांतिकारी, ईमानदार या हो फरेबी
घर का पालतू कुत्ता हो या बिल्ली
सबको गले लगा जन्मदिन की बधाई देते
पर ये लोग हमारे बारे में क्यों नहीं सोचते?
हमारा जन्मदिन कभी क्यों नही मनाते” ?

“हमसे है इनका जीवन, हमसे ही ये जिंदा रहते
हमसे है हरियाली, हम देते इनको स्वच्छ हवा
हमारे फल,फूल, बीज ,पत्ते, टहनी, जड़े, तना
न्योछावर इनपर हम करते
फिर भी कभी ना कहा शुक्रिया ,
ना कभी प्यार जताते।”

“हमने कभी ना दिया धोखा सदा साथ निभाया
जीते जी और मरने के बाद भी भला किया
कब बीज डाला कब पहली कोपल फूटी
कब निकला पहला पत्ता कुछ भी इनको याद नहीं”

“हम है परोपकारी जीवन भर इनके काम आते
फिर भी कभी हमारा जन्मदिन ना मनाते।
सिर्फ पर्यावरण सुधारने की बाते करते
फिर सब भूल हमें तोड़ते, हमे काटते ,
हमे उखाड़ अपने घर बनाते
स्वार्थी है ये इतने, हमेशा देने वालो को ही नोच डालते”

“माना हम बोल पाते नहीं, अपना दर्द बता सकते नही
ये तो है समझदार,हमारी भावनाएं समझ पाते क्यूं नहीं
जाकर कहो उन्हे, हमें थोड़ा सहलाए थोड़ा पुचकारे
हो सके तो एक बार हैप्पी birthday
वाला गाना हमारे सामने गुनगुनाए
खुशी से फूल कर दुगुना देंगे इन्हे इतना प्यार।
जीवन में सबके ला देंगे बहार ही बहार”

सुन कर उन बेजुबानों का दर्द
इंसानों की स्वार्थी प्रवृत्ति पर आ गई मुझको शर्म
कितने एहसान फरामोश है हम
जो हमेशा देते हमको ,उनको ही जाते भूल
मुंह छुपा चुपके से आ गई घर के अंदर
सोने से पहले किया निश्चय
पेड़ पौधो का आभार प्रकट करूंगी हर रोज।

दादी का जन्मदिन

June 4, 2022

“अरे जूही , ये पैसे ले, एक केक ले आना शाम को, आज मेरा जन्मदिन है”
” दादी 2 महीने पहले तो आपने सबके लिए मिठाई मंगवाई थी यह कहकर कि आपका जन्मदिन है”।
दादी ने हंस कर कहा,” तू केक खा, मेरा दिमाग मत खा, जो कहा है बस वो कर”।

3 महीने बाद अचानक दादी ने सबको बोला” आज शाम को पिज्जा पार्टी मेरी तरफ से, आज मेरा जन्मदिन है”
जूही को हैरान देखकर जूही की मम्मी यानी रूही ने मुस्कराते हुए कहा,” जूही हैरान मत हो। दादी साल में 7 -8 बार अपना birthday मनाती है। अभी अगले महीने वापिस दादी का जन्मदिन आने वाला है।”
” लगता है दादी को जब भी मीठा खाने का मन करता है या पार्टी करने का मन करता है, तब अपना birthday मना लेती है ” जूही बोली।
“दादी बताओ ना आप साल में इतनी बार अपना जन्मदिन क्यों मनाती हो?”
” जूही शाम को आराम से बैठ कर समझाती हूं, पिज्जा पार्टी के बाद, अभी तू कॉलेज जा”।

शाम को जूही ने जिद पकड़ ली,” दादी अब बताओ आप साल में इतनी बार अपना जन्मदिन क्यों मनाती हो? एक इंग्लिश तारीख के हिसाब से और एक हिंदी तिथि के हिसाब से समझ आता है बाकी हर दूसरे महीने आपकी बर्थडे पार्टी कैसे होती है?”

दादी ने बहुत प्यार से पूरे परिवार को पास बिठाया और बोली,” बेटा मेरा ऐसा मानना है कि हर इंसान एक बार तब जन्म लेता है, जब वो मां के पेट से बाहर आता है, पर औरत का अपने जीवन काल में समय समय पर नए नए role में जन्म होता है,।
मैं समझाती हूं”
“देख एक तो जिस दिन जब मैं अपनी मां के पेट में 9 महीने रहने के बाद इस दुनिया में आई , वो था मेरा जन्म दिन। तो इंग्लिश तारीख के हिसाब से मेरा एक बर्थडे”
“हिंदू कैलेंडर के हिसाब से तिथि आगे पीछे होती रहती है तो हुआ मेरा दूसरा birthday “
ठीक?
’11 साल की उम्र में जब मुझे पहली बार periods आए जिसको तुम लोग chums बोलते हो, उस दिन मेरा एक पूर्ण औरत के रूप में जन्म हुआ तो मैं तबसे लेकर आज तक उस तारीख को अपने औरत बनने का जन्मदिन मनाती हूं तो ये हुआ मेरा 3rd birthday “।

“20 साल की उम्र में मेरी शादी हुई, ससुराल जाकर मेरा पत्नी, बहु, भाभी जैसे कितने रूप में जन्म हुआ । मैं सिर्फ बेटी नही थी बल्कि मेरी जिम्मेदारियां बढ़ गई थी। सो मैं उस दिन को याद कर अपने नए किरदार के जन्म का बर्थडे मनाती हूं। ये हुआ मेरा 4th birthday”।

“22 साल की उम्र में मैं मां बनी , तो मेरा मां के रूप में जन्म हुआ। तो हुआ न मेरा नया जन्म। एक बात बताऊं कहते है औरत जितनी बार बच्चे को जन्म देती है उतने बार उसका नया जन्म होता है, मां बनना कोई गुड़िया का खेल नहीं है। बच्चे को निकालने में जो दर्द होता है, उससे भयंकर दर्द दुनिया में कोई नही है, हां तो ये हुआ मेरा 5th birthday,। मैने 2 बार मां बनने को पीड़ा सही तो ये हुआ मेरा 6th birthday “

फिर तेरे पापा की शादी हुई, मेरा नया जन्म हुआ एक सास के रूप में,। तो जिस दिन तेरी मम्मी इस घर में आई और मेरा ओहदा बदला, उस दिन को मैं अपने सास बनने की वर्षगांठ के रूप में मनाती हूं “।
” दादी फिर तो आप जिस दिन मेरा जन्म हुआ उस दिन आप दादी बनी, एक नए रूप आपको मिला तो आप मेरे जन्म वाले दिन क्यों अपना जन्मदिन नही मनाती” ?जूही ने मचल कर पूछा ।

दादी ने हंस कर जवाब दिया, ” मनाती हूं ना, जिस दिन तूने दा दा बोला था, मैं उस दिन केक काटती हूं, ” दादी ने जूही को अपने से चिपका कर बोला।

“,बच्चो ये सच है औरत क्या आदमी भी अपने जीवन में बहुत जन्म लेता है, हर परिस्थिति में उसकी जिम्मेदारियां बदल जाती है, हर नए role में एक नया जन्म होता है।
देखो इतने सारे जन्मदिन मनाना सिर्फ बहाना है परिवार के साथ celebrate करने का, मेरे जीवन के कुछ सुनहरी पलो और उपलब्धियों को याद करने का ।इस तरह मैं भगवान का धन्यवाद भी देती हूं कि हर परिस्थिति में उसने मेरा साथ दिया और मुझे लायक बनाया कि मैं अपनी जिम्मेदारियां कुशलता से निभा सकूं ।इसीलिए साल में कई बार मैं अपना birthday मनाती हूं।
जूही ही नही बल्कि पूरा परिवार दादी के विचार सुन कर हैरान था । जूही को अपनी दादी पर गर्व महसूस हो रहा था।
उसने दादी के गले से झूल कर कहा” दादी आप महान हो। ऐसा तो आजतक किसी ने सोचा ही नहीं होगा। मैं सबको आपकी सोच के बारे में बताऊंगी। मैं तो फेसबुक, instagram और अपने blog पर भी आपके बारे में लिखूंगी।
इतने में जूही की मम्मी हंस कर बोली,” मम्मीजी अब आपका अगला जन्मदिन कब है, सब धूमधाम से मनाएंगे।”
दादी भी हंस कर बोली,” अगली बार तो मेरा इंग्लिश तारीख के हिसाब से बर्थडे है, जूही, चल इस बार तेरी सब फ्रेंड्स को बुला, D J party करते है। Mcdonald का बर्गर और वो तुम क्या खाते हो ? हां मोमो, वो ऑर्डर करेंगे, इस बार हो जाए धमाल, आखिरकार मेरा 80th birthday है, पार्टी तो बनती हैं।”

amnesty / राज माफी/ आम माफी/क्षमा दान

May 29, 2022

अंधेरनगरी कहो या कहो गुंडागर्दी
पैसे और सत्ता की हर जगह गर्मी
निर्दोष , मासूम चढ़ जाते फांसी
ऊंची पहुंचवाले पा जाते राज माफी
गरीब का सांस लेना भी है गुनाह
पैसे वाले को मिल जाती राजनीति पनाह
कमजोर की जरा सी गलती पर कर देते नंगा
बलशाली अपराध कर भी पाता माफी का तमगा
इतिहास साक्षी है कितने किस्सो का
जब सत्ता और पैसे के बल पर मुजरिमों को बक्शा
सरकार के विरुद्ध नारे लगा की पत्थरबाजी
ऐसे देशद्रोहियों को भी मिल जाती आम माफी
अकेली औरत के सामूहिक बलात्कारी पा जाते सरकार से क्षमा का दान
नादान बच्ची का बलात्कार,
पूरे परिवार का नर सिंहार,
धर्म के नाम पर बलि चढ़ाना
जिंदा इंसान की आग में झोंकना
जिनके कारनामे सुन रूह हमारी कांप जाती
ऐसे जघन्य अपराधियों को भी मिलता क्षमादान
कब तक बंधी रहेगी कानून की आंखों पर पट्टी
कब तक संगीन अपराधी पाते रहेंगे राज माफी।
सजा का उद्देश्य है सबक सिखाना
ध्यान रख अपराध न दोहराना
क्षमा का दान मिलने के बाद क्या वो शातिर अपराधी सुधर जायेगा?
या सिर ऊंचा कर वापिस वही अपराध दोहराएगा?
क्या कोई मापदंड नहीं है मुजरिमों को आम माफी देने का

Amnesty/आम माफी/ राज माफी

May 28, 2022

यह कहानी बिल्कुल मनगढ़ंत है। किसी भी पात्र का किसी भी धर्म या इतिहास से कोई नाता नहीं है। यद्यपि कहानी का सार जैनधर्म से लिया गया है।

बहुत साल पहले की बात है, राजा उदय अपनी न्यायप्रियता के कारण प्रसिद्ध थे। किसी के साथ अन्याय उनसे सहन नही होता था।कहा जाता था उनके राज्यकाल में शेर और बकरी एक ही घाट से पानी पीते थे।
उनकी भरसक कोशिश रहती थी कि उनके राज्य में कोई दुखी न रहे। पर भ्रष्टाचार तो कहीं भी अपने हाथ पैर जमा ही लेता है। तो उनके राज्य में भी कुछ कर्मचारी ऐसे थे जो राजा की आंखो में धूल झोंक कर अन्याय को बढ़ावा दे रहे थे।

राज्य के दूर कोने में नीची जाति वालो की एक बस्ती थी। जहां राजा की कभी नजर नही पड़ती थी। उनकी तकलीफों का राजा को भान भी नही था।
यह घटना वहीं की है।
रामू अपनी मां को प्यास से तड़पता देख रहा था क्योंकि उनके इलाके का पानी का कुंआ बिलकुल सूखने की कगार पर था। पानी की एक बूंद नही मिल रही थी।
कुछ ही दूर पर ठाकुरों के कुंए पानी से लबालब भरे हुए थे क्योंकि शुद्रो की बस्ती थोड़ी ऊंचाई पर थी सो सारा पानी नीचे बह जाता था।
जातिवाद का बोलबाला था इसीलिए नीची जाति वालो को ठाकुरों के कुंए को छुने की भी इजाजत नहीं थी।
रामू से अपनी मां और बाकी गांव वालो की तड़प देखी न गई और एक रात चुपके से वो ठाकुरों के कुएं से पानी लेने चला गया।
जब ऊंची जाति वाले ठाकुरों को इस बात का पता चला तो उन्होंने बहुत बवाल उठाया। अपने गुण्डो को भेज शुद्रों की बस्ती पर हमला कराया और वहां के लोगो को बहुत मारा।
रामू और उसके साथियों को यह अन्याय सहन नही हुआ सो रामू ने बस्ती वालो को इकठ्ठा किया और राजा के महल के बाहर मोर्चा निकाला और राजा के विरुद्ध में बहुत नारे लगाए।
राजा के कर्मचारियों ने गांव वालो को कारागार में डाल दिया था क्योंकि उन्होंने राजा के खिलाफ आवाज उठाई थी,राजा का अपमान किया था।

राजा जैन धर्म का अनुयाई था और उन दिनों जैन धर्म वालो के पर्युषण ( 8 दिन की कठिन तपस्या,दिन भर पूजा भक्ति, खाने पीने की बहुत सी चीजों का त्याग, दिन में सिर्फ एक बार खाना, इत्यादि) चल रहे थे, तो राजा धार्मिक पूजा पाठ, आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और कड़क तपस्या में व्यस्त था।
राजा को गांव वालो की आक्रोश की कानो कान खबर नहीं पड़ी। राजा जब भक्ति के बाद उसके अपने मंत्रियों और कर्मचारियों से राज्य के बारे में पूछता तो उसको यही जवाब मिलता, ” महाराज सब ठीक ठाक चल रहा है”।

जैन धर्म के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि हर जैन धर्म का अनुयाई तपस्या के आखिरी दिन सबसे साल भर में जाने अंजाने किए गए अपराधो या किसी का दिल दुखाया हो तो मिच्छामि दुक्कडम् बोल हाथ जोड़ क्षमा मांगे तभी उसको मुक्ति मिलती है।
तो आखिरी दिन राजा भी हर कर्मचारी के पास जाकर मन वचन काया से जाने अंजाने में किए गए अपराधो की क्षमा मांग रहा था।
कारागार में जाकर भी उसने मिच्छामि दुक्कडम् बोल सबको राजमाफी दे दी।और सबको आगाह किया कि धर्मानुसार वो उन सब कैदियों को आम माफी दे रहा है जिनके अपराध मामूली थे।
इसी क्रिया में जब वो आगे गया तो उसने सब गांव वालो को बंद पाया। उसने जैसे ही उनसे मिच्छामि दुक्कडम् बोला, रामू से रहा न गया, उसने तुरंत पूरी की पूरी कहानी राजा को बताई और कहा,” महाराज हम आपकी प्रजा है, हम मानते है हमने आपके विरुद्ध आवाज उठा, नारे लगा जुर्म किया है, पर महाराज आपके राज्य में हमारे साथ अन्याय क्यों होता है, जबकि हम आपका मैल उठाते है, नीची जाति में हम अपनी मर्जी से नहीं जन्मे, हम आप सभी का काम करते है, हमारे बिना किसी भी ऊंची जाति वाले का गुजारा नहीं हो सकता, फिर भी हम तकलीफ सहते है, हम पर अत्याचार होता है। हमने आपके विरोध में आवाज उठाई तो हमें सजा भी मिली और आपने हमें राज माफी दे मुक्त भी किया, पर उनका क्या जो आपकी प्रजा पर अत्याचार करते है?”
राजा उदय को अपनी गलती का एहसास हुआ, उन्होंने ठाकुरों को और बाकी कर्मचारियों को बुला बहुत डांटा और अपना फैसला सुनाया कि गांव वालो के लिए नए कुएं बनवाए जाए और कुंए बनवाने का खर्चा ठाकुर जाति उठाएगी। ईश्वर की दी हुई नैमतो पर सबका बराबर का हक है, ईश्वर के आगे कोई छोटा बड़ा नही है।
बाद में राजा ने भरी सभा में में ऐलान किया ,” आगे से राज माफी या आम माफी के हकदार वो ही होंगे जो किसी निर्दोष या मासूम पर अत्याचार नहीं करेंगे। खून, चोरी, हत्या करने वाले अपराधी को हालत जानकर एक बार माफ कर दिया जा सकता है पर निरपराधो, कमजोरों या जाति के नाम पर किए गए अपराधी राजमाफी के हकदार नहीं होंगे।”

मैं, मेरे वो और शुक्रवार का शब्द देर

May 22, 2022


मेरी और पतिदेव की गुफ्तगू की श्रृंखला में एक और कड़ी

बैठी हो चुपचाप, क्या कोई नही है आज काम

जल्दी से दे दो चाय का हो रही है , मुझे दफ्तर भी है जाना

गुस्से में तमतमाते हुए हमने कहा
तुम्हे सिर्फ चाय की पड़ी है
यहां देर शब्द पर मेरी जान अड़ी है
क्या लिखूं कुछ समझ नही आ रहा
हे प्रिय मदद करो मेरी, कुछ तो दे दो सहारा

पतिदेव मुस्कराते हुए बोले
देरी करने में तुम तो माहिर हो एकदम
फिर क्यों देर शब्द पर तुम गई अटक
तैयार होने में तुमको लगती है देर
कहीं जाना हो तो तुमको होती 2 घंटा देर
तुम्हारे whatsapp के चक्कर में अक्सर ऑफिस में हो जाती है देर
सुबह अगर नींद खुले देर से तुम्हारी
शामत आ जाती है हमारी

मैं देरी से आऊं तो हो जाती तुम आगबबूला
तुम्हारी इच्छा पूरी होने मे देर हो तो
बरसाती हो बम का गोला
बाई देर से आए तो चिल्लाने के बजाय बन जाती हो बर्फ की सिल्ली
बच्चो से देर हो जाए तो तुम्हारे गुस्से से डर,
बैठ जाते बन भीगी बिल्ली

रेस्टोरेंट में भीड़ के कारण हो जाए देर
तो चिल्लाती हो तुम इतना, सुनता है पुरा नगर
देर करना हो गई है आदत तुम्हारी
पर तुम्हे किसी और की देरी के कारण
करना पड़े इंतजार
तो भूल दुनिया दारी सुनाती हो बाते चार

पतिदेव को अचानक लगा , बोल रहा हूं ज्यादा
बात संभाल लू वरना रहना पड़ेगा भूखा प्यासा
वाणी में घोल मिठास, ले मेरे हाथो में अपना हाथ
बोले बहुत प्यार से
है प्रिय, देरी होने पर जब तुम घबराती हो तो
लगती हो हसीन और आ जाता है तुम पर प्यार
दिल करता है देखता रहूं तुमको बार बार
इतना काफी है या और
चाहिए मसाला देर शब्द के लिए।
दूर करो ये चिंता , जरा मुस्करा दो मेरे लिए
अरे कहना भूल गया शाम को चलेंगे देखने पिक्चर
समय से पहुंच जाना, ना करना देर ।

पतिदेव की चालाकी गई थी मैं समझ
सुन अपनी खामियां कहीं चढ़ ना जाए मेरा पारा
डाल मीठी बातों का शहद, गुस्सा मेरा उतार डाला
सोच लिया कर अपने ही दिमाग का इस्तेमाल
लिख लूंगी चंद पंक्तियां खत्म होने से पहले रविवार
घुस गई रसोईघर में बनाने को नाश्ता और चाय
पतिदेव को ऑफिस जाने में कहीं देर न हो जाए।

देर हो गई

May 21, 2022

“देर न करना, रात होने से पहले घर आ जाना” उर्मी ने अपनी 14 साल की बेटी को बोला।
” मम्मा मेरी क्लास होती है शाम को, देर तो हो जायेगी, जल्दी कैसे आऊंगी” रोमा ने उर्मी को समझाया।”
” बेटा जमाना खराब है, हम लोग जिस मोहल्ले में रहते है, वो सुरक्षित नहीं है। तू देखती है ना नुक्कड़ में पान की दुकान पर खड़े मवाली लड़के हर आने जाने वाली लड़की पर फिकरे कसते है, बेचारी लड़किया कितना डर कर निकलती है। बस मैं कुछ नहीं सुनना चाहती, अपनी टीचर को बोल कर क्लास का समय बदलवा लो। बोल देना कि तुम्हारी मां को पसंद नहीं है लड़की का शाम गए देर से घर आना। “
“मम्मा, मेरी सब सहेलियां भी तो देर से घर पहुंचती है, उनको कोई रोक टोक नहीं है। दुनिया भर की बंदिशे मेरे लिए ही है।” रोमा पैर पटकते हुए रोते हुए वहां से हट गई।
उर्मी को समझ नही आ रहा था कि रोमा को कैसे मर्दों की गंदी नजरों के बारे में समझाए।
कैसे उसे बताए कि घर के बाहर वासना के मारे कामुक भेड़िए घूम रहे हैं जो मौका देखते ही मासूम कलियों को नोच लेते हैं।
रोमा ने अपनी टीचर से बात करके क्लास का टाइम बदलवा लिया। आते ही बोली,” अब तो खुश हो ना। सूरज डूबने से पहले ही घर आ जाऊंगी। पर मम्मा आप भी तो ऑफिस से देर से आती हो, रात हो जाती है, क्या आपको डर नही लगता”, क्या आप पर लोग बुरी नजर नही डालते? “
उर्मी ने बहुत प्यार से समझाया, ” बेटा तुम अभी नादान हो, भोली हो, अपना बचाव खुद नहीं कर सकती हो । इसीलिए तुम्हे बोला घर जल्दी आ जाओ, घर से सुरक्षित जगह कोई नहीं है। घर पर तुम्हारे पापा जल्दी आ जाते है। सो मुझे कोई डर नही है”।
उर्मी बहुत संतुष्ट थी कि अब डरने की कोई बात नही है। किसी दिन अगर उसे ऑफिस से आने में देर भी हो जायेगी तो कैलाश यानी कि उसका पति तो घर पर रहेगा ही सही, रोमा की कोई फिकर नहीं होगी।
4 -5 महीने के बाद उर्मी को रोमा के व्यवहार में कुछ बदलाव महसूस हुआ। तितली की तरह उधर से उधर फुदकने वाली उर्मी बहुत सहमी सहमी नजर आने लगी थी।
उसने कैलाश से भी इसका कारण पूछा पर कैलाश ने उर्मी के मन का वहम कह कर बात टाल दी।
उर्मी ने भी इस बात को ध्यान नही दिया। हो सकता है बढ़ती उम्र की मनोदशा और शारारिक बदलाव के कारण रोमा में बदलाव आया है। सोच कर वो भी अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गई।
एक दिन शाम को वो जब घर आई तो रोमा नजर नही आई। उर्मी ने कैलाश से रोमा के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वो भी काम से बाहर गया था।
इधर उधर होगी, या पड़ोस में सहेली के घर गई होगी सोच उर्मी खाना बनाने में लग गई।
इतने में उसका छोटा बेटा सोनू भागता हुआ आया और चिल्लाया, ” मम्मा जल्दी चलो देखो दीदी को क्या हो गया है”
उर्मी भाग कर कमरे में पहुंची तो एकदम सकते में आ पत्थर हो गई । सामने पलंग पर रोमा अस्तव्यस्त दशा में बेहोश पड़ी थी। चिल्लाते हुए वो रोमा को हिला कर होश में लाने की कोशिश करने लगी। शोर सुन कर कैलाश भी अंदर आ गया। वो खुद भी रोमा की हालत देखकर जड़ हो गया था। सोनू ने शोर करके आस पास वाले पड़ोसी को इकट्ठा किया और फोन करके एंबुलेंस को भी बुला लिया।
जब वो हॉस्पिटल पहुंचे तो डॉक्टर ने जवाब दिया,” आपने लाने में देर कर दी।”
उर्मी ने कैलाश की तरफ बहुत कातर निगाहों से देखा। कैलाश खुद भी सदमे की हालत में खड़ा था।
और वो उर्मी से नजर नही मिला पा रहा था।
कुछ दिन के बाद उर्मी को रोमा की अलमारी में उसकी डायरी मिली, जिसको पढ़ कर उर्मी को जोरदार धक्का लगा। रोमा ने कैलाश की सब करतूतों का पर्दाफाश किया था अपनी डायरी में।
उर्मी को विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई पिता अपनी बेटी की साथ कुकर्म कर सकता है।
उर्मी ने भागकर कैलाश का गिरेबान पकड़ा और चिल्लाई,” मैं अपनी बेटी को बाहर के राक्षसों से बचाना चाहती थी। मुझे मालूम नहीं था कि सबसे बड़ा दानव मेरी बेटी के बाप के रूप में मेरे ही घर बैठा है।कैलाश तुम्हारे हाथ नही कांपे , तुम्हारी आत्मा ने तुम्हे नही कचोटा। तुम तो ऑफिस में इतने बड़े ओहदे पर हो, तुम्हारी हिम्मत कैसे पड़ी अपनी बेटी पर बुरी नजर डालने पर। मैने तुम्हारा असली रूप पहचानने में बहुत देर कर दी। इतने सालो से हम साथ रह रहे है, मुझे कभी भी अंदेशा नहीं हुआ कि मैं एक इतनी गन्दी प्रवृत्ति वाले इंसान के साथ रह रही हूं, ” उर्मी बिना रुके विलाप करती रही।
कैलाश को शायद अपनी गलती का एहसास हुआ इसीलिए वो भी मुंह नीचा किए घर से निकल गया।
शाम को उर्मी के पास पुलिस का फोन आया तो उसे मालूम पड़ा कैलाश का रेल की पटरी पर एक्सीडेंट हो गया और वहीं तुरंत उसकी मौत हो गई है।
8 दिन के अंदर उर्मी को ये दूसरा धक्का लगा था।
वो समझ गई थी कि कैलाश ने आत्महत्या की है क्योंकि वो तो रेल से सफर करता नही था। उर्मी ने मन ही मन सोचा कि कैलाश ने अपने कर्मों की सजा खुद ही चुन ली थी।
उसे बहुत अफसोस हो रहा था कि क्यूं वो मां होकर भी रोमा की मनोदशा समझ नहीं पाई, अगर उसे पहले ही कैलाश की बदनीयती का भान हो जाता तो वो अपनी बेटी को बचा सकती थी।
पर अब पछताने से कोई फायदा नहीं था। क्योंकि अब बहुत देर हो चुकी थी।

माचिस की तीली और इंसान

May 15, 2022

कल हो गई एक माचिस की तीली से मुलाकात
मुझे देख शुरू कर दिया उसने वार्तालाप
उस अदना सी तीली की बातों से हो गई मैं परेशान
आप भी सुनेंगे तो हो जायेंगे हैरान
उसके ही शब्दो में,
माना मैं हूं छोटी, माना मैं हूं सस्ती
इंसानों की बस्ती में मेरी नही कोई हस्ती
फिर भी मेरे बिना बेकार है तेरी जिंदगी
घर हो ,या हो कारखाना मंदिर हो या हो मयखाना
चलते सब मेरे दम पर, मेरे घिसने से होता उजाला
मंदिर की ज्योत जले मुझसे
तो इंसानियत का विनाश भी मुझसे
ऐ इंसान बताऊं इक राज की बात
वैसे ज्यादा फरक नही तुझमें और मुझमें
फिर भी एक बात में हूं मैं तुझसे महान
ये सुन मेरा सिर चकराया
कहां मैं, कहां ये नगण्य तीली?
कैसी हममें समानता ,कैसे वो मुझसे महान बनी?
फिर भी सुनने को ध्यान लगाया,

जरा से घर्षण से सुलग जाती हूं मैं
तू भी तो भभक जाता जरा सा छुने से
मेरे सिर रसायन की छोटी टोपी
तेरे सर अहम की बड़ी टोपी
मेरी टोपी जलने के बाद हो जाता मैं नाकारा
तेरा घमंड टूटे तो तू भी हो जाता बेचारा
मैं रहता मेरे जैसों के साथ छोटी अंधेरी डिब्बी में
तू भी छुपा रहता अनजान लालसाओ की घुप्प कोठरी में
काम निकल जाने के बाद कोई मुझे नही पूछता
तू भी जब काम का ना रहे तो अकेला डोलता
मैं भी करता विनाश
तू भी लगाता अपनो पर घात
पर ए इंसान इतना न खुद पर इतरा
फिर भी एक बात पर मैं हूं तुझे अच्छा
मैं तो खैर जन्मा सिर्फ जलने को
तू क्यूं लगा रहता दिन रात दूसरो को जलाने को
मैं ना खुद जलता ना खुद से किसी को जलाता
तू तो अपनी ही जलन से खुद जलता और सबको भी जलाता
मैं तो चाहता, हो मुझसे जग का निर्माण
तू बना मुझे अपना हाथियार ,कर रहा सबका नाश
बिना घर्षण मैं हूं बेकार
तू तो अपनी खुद की आकांक्षाओं से खा रहा मार
वक्त है संभल जा ,ध्वंस करने में ना अपना जन्म गंवा
ये कह वो माचिस की तीली हवा में उड़ गई
दिखा मेरी औकात,सिर मेरा शर्म से झुका गई,
पर जानती हूं में ये आत्ममंथन है कुछ क्षण का,
फिर किसी नए लालच, उत्कंठा, सपने से हो वशीभूत, माचिस को बना अपना हथियार
चल पड़ेंगे हम सब विध्वंस की ओर।

माचिस की तीली

May 14, 2022

” पूजा मेरी फाइल कहां है”?
“मम्मी आपको मालूम है मैं सुबह जूस पीती हूं, घर में कोई भी फल नहीं है, अब मैं क्या पियूंगी”
” अरे पूजा कबसे कह रही हूं, मुझे myntra पर ऑनलाइन शॉपिंग करना सीखा दो, पर तुम्हारे पास समय नहीं है” पूजा की सास ने हल्का सा कटाक्ष किया।
” भाभी कल ऑफिस की मीटिंग में client को सही data नहीं दिया,” पूजा के देवर समर ने थोड़ी ऊंची आवाज में पुजा से पूछा
” नही समर भैया मैने सही data दिया था, आपकी excel sheet updated नहीं थी!, पूजा ने बहुत शांत भाव से समर को जवाब दिया

सुबह से पूजा के पापा जो 2 दिन के लिए बेटी के घर आए थे उसको मिलने , देख रहे थे कि पूजा चक्कर घिन्नी की तरह पूरे घर में डोल रही थी। घर का हर सदस्य पूजा के नाम की रट लगाए हुआ था।
और पूजा चेहरे पर शिकन लाए बिना घर का सब काम एक मुस्कराहट के साथ कर रही थी।
रोज सुबह घर की ज़िम्मेदारी पूरी कर के वो
अपने पति रमन और देवर समर की फैक्ट्री में administration भी संभालती थी।
पूजा के पापा को बहुत हैरानी हुई की समर के गुस्सा करने पर भी पूजा को बिल्कुल भी गुस्सा नही आया।
इतने में पूजा की बाई जो दिन बिना बताए छुट्टी पर थी, आई तो पूजा ने उसको भी बिना डांटे बहुत धीरे से कहा,” कम से कम बता कर छुट्टी लिया कर”

उन्हे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि जो पूजा शादी से पहले बात बात पर माचिस की तीली की तरह भभक जाती थी अचानक इतनी बदल कैसे गई थी।
इतने में पूजा ने आकर कहा ,” पापा चलो , फैक्ट्री जाते हुए मैं आपको भुवाजी के घर छोड़ देती हूं, बाद में आप सीधा मेरी ऑफिस आ जाना, शाम को साथ ही घर आ जायेंगे।”
रास्ते में पापा से रहा नही गया और उन्होंने पूजा से उसके व्यवहार के बदलाव के बारे में पूछा।
” पूजा तुम इतनी बदल कैसे गई हो। याद है, शादी से पहले तुमसे कोई ऊंची आवाज में बोल लेता था, या तुम्हारी कोई खामी बताता था,तो तुम्हे कितनी जल्दी गुस्सा आ जाता था। एक बार तो तुम्हारी मम्मी ने कह भी दिया था कि पूजा तो माचिस की तीली की तरह है, जरा से घर्षण से सुलग जाती है। और तुम्हारा गुस्सा तो हमेशा तुम्हारी नाक पर बैठा रहता था। तुम जरा सा भी अन्याय नहीं सहन कर पाती थी, अपने घर जो लड़का काम करता था, उसको भी तुमने एक बार कितना गुस्सा किया था जब वो बिना बताए छुट्टी पर चला गया था। और आज तुम्हारी बाई के सामने तुम्हारी आवाज भी नही निकली। तुम्हारे देवर ने तुमसे ऊंची आवाज में बात की, तुमने उसको भी नजरंदाज किया। तुमको हम कुछ भी काम करने को बोलते थे तो तुमको कितना गुस्सा आ जाता था। तुम्हारी सास ने भी तुम्हे ताना मारा तो भी तुम मुस्कराती रही।क्या हो गया तुमको? और हां तुम्हारे भाई ने भी एक बार कहा था कि पूजा को तो जरा सा छुने भर की देर है पूरी की पूरी माचिस की डिब्बी जैसे भभकती है वैसे आग निकलेगी इसमें से। पूजा के रोम रोम में माचिस की तीलियां भरी है, समझ नही आ रहा, मेरा शोला बर्फ में कैसे बदल गया। ?”

पूजा ने हंसते हुए पापा को देखा और उनके हाथो को पकड़ कर बोली,” पापा बंबई के उमस वाले वातावरण में आपकी पूजा की माचिस नरम पड़ गई है।अब कितना ही तीली को रगड़ लो, आग निकलती ही नही है,”।
” पापा ये सच है मैं बदल गई हूं, अब मेरी जिम्मेदारियां बढ़ गई है, मुझे कितने role एक साथ निभाने पड़ते हैं, अब भी अगर में बात बात पर गुस्सा करूंगी तो अपने बच्चो को क्या संस्कार दूंगी? अगर बाई पर गुस्सा करूंगी तो वो काम छोड़ देगी, तब मुझ पर काम का बोझ बढ़ जाएगा। मम्मीजी को मैने ही कहा था कि मैं उनको ऑनलाइन शॉपिंग सीखा दूंगी, पर सच में समय ही नही मिला। मेरी ही गलती थी”
” ऐसा नहीं है कि अब मुझे गुस्सा नहीं आता या अन्याय देखकर मेरा खून नही खौलता। पापा एक राज की बात बताऊं, आपकी ये माचिस की तीली अभी भी अपनी वाणी से, शब्दो से, नजर से , अपने गुस्से से या अपनी मौजूदगी से कहीं भी आग लगाने की क्षमता रखती है। पापा माचिस की तीली या तो खुद जलकर रोशनी फैलाती है या फिर विनाश करती है। मुझे भी समझ आ गया है की गुस्सा करके ना मैं सिर्फ अपना नुकसान करूंगी पर घर के रिश्तों पर मेरे गुस्से का असर पड़ेगा।गुस्सा करूंगी तो मेरी सेहत खराब होगी, घर की शांति भंग होगी और सबसे बड़ी बात सब रिश्ते खराब हो जायेंगे। “
“और पापा ऑफिस में मैं boss की कुर्सी पर बैठती हूं, अगर मै छोटी छोटी बात पर गुस्सा करूंगी तो मेरे कर्मचारी मेरे से नाराज रहेंगे, फैक्ट्री के काम में नुकसान होगा, इसीलिए अब मैने अपने गुस्से पर, वाणी पर, शब्दों पर नियंत्रण करना सीख लिया है”।
” आपको याद नहीं, आप ही ने तो एक बार कहा था, बेटा खुद को माचिस की तीली मत बनाना,जो थोड़ा सा घर्षण लगते ही सुलग जाती है ,खुद को वह शांत सरोवर बनाओ ,जिसमें कोई जलती हुई माचिस की तीली भी फैंके तो,वह खुद ही बुझ जाए।
बस आपको कही हुई बात गांठ बांध ली है”।
पूजा के पापा एकटक अपनी बेटी को निहारते हुए सोच रहे थे कि पूजा कितनी समझदार हो गई है और उन्हें अपनी बेटी पर बहुत गर्व महसूस हो रहा था

Password

May 8, 2022

“रीना मेरा laptop कहां हैं? कितनी बार बोला है मेरे ऑफिस की चीजों को हाथ मत लगाया करो। Login करने का टाइम हो गया है, 9 बजे मेरी मीटिंग है। देखो सुबह की भागा दौड़ी के कारण मैं मीटिंग का password ही भूल गया”।
“समर इतना क्यों चिल्ला रहे हो। तुम जानते हो मेरा भी ऑफिस टाइम है, अभी बंटी की ऑनलाइन क्लास शुरू हो जाएगी। उसका लैपटॉप भी स्टार्ट कर दो। और सुनो उसके लैपटॉप पर गूगल सर्च और गेम्स पर पासवर्ड लगा दो, नही तो क्लास के बीच वो खेलना शुरू कर देगा नही तो कुछ भी सर्च करेगा”।
” और समर जरा देखो ना, नेटबैंकिंग का पेज खोल कर सब बिल भी चुकता कर दो।और सुनो पासवर्ड ध्यान से डालना, पिछली बार की तरह अकाउंट बंद न हो जाए ।
” रीना जरा OTP( one time password) देना तुम्हारे फोन पर आया होगा”।
दिन भर उनके घर में ऑफिस, इंटरनेट और password की ही बाते होती रहती थी।
जिंदगी बस लैपटॉप और पासवर्ड्स में सिमट कर रह गई थी।
यह कहानी रीना और समर के घर रोजाना दोहराई जाती थी। वो दोनो lockdown के कारण वर्क from home कर रहे थे और बंटी काआधा दिन ऑनलाइन school में निकल जाता था।
बहुत मुश्किल के दिन निकल रहे थे। ऑफिस का काम, बिल्डिंग में बाई को आने की मनाही थी इसीलिए सारा काम हाथ से करना पड़ रहा था।
हजारों work from home करने वाले लोगो की तरह शुरुआत में इनको भी लगा था कि घर बैठे काम करने में बहुत मजा आयेगा। आराम से काम करेंगे, देर तक बिस्तर पर सोएंगे, मन चाहा खायेंगे मजा ही मजा रहेगा
पर इनको कहां पता था कि काम का बोझ और बढ़ जाएगा, ऑफिस में काम करने का समय बढ़ जाएगा, देर रात तक meetiings चलेंगी।
दोनो अपने ऑफिस के काम में इतना मशगूल हो गए थे कि उनको बंटी से तो क्या आपस में भी बात करने का समय नहीं मिलता था।
आखिरकार ऑफिस वाले पूरा पैसा वसूलना चाहते थे, उनका कहना था कि घर से ऑफिस और वापस घर आने का travelling का समय बच रहा है तो सब कर्मचारियों को ज्यादा काम करना चाहिए।
7 साल के बंटी को वैसे ही ऑनलाइन स्कूलिंग में मजा नहीं आ रहा था। ना दोस्त थे, ना मस्ती होती थी, ना किसी से झगड़ा, ना भागा दौड़ी। बस दिन भर घर में घुसे रहो। मम्मी डैडी को उस बेचारे की मनोदशा समझने का भी समय नहीं था।
रीना ने एक टाइम टेबल बना कर रख दिया था, tv देखने का , ipad पर गेम्स खेलने का, पढ़ाई का, सब का समय निश्चित था। बंटी की ऑनलाइन क्लासेज तो 1 बजे खतम हो जाती थी। फिर दिन भर वो खाली इधर से उधर घूमता रहता था।
रीना और समर तो दिन भर अपने अपने लैपटॉप पर लगे रहते थे, बेचारा बंटी इस कमरे से उस कमरे, उस कमरे से इस कमरे में ही घूम घूम समय निकालता था।
कभी यहां का सामान उधर पटका, उधर का इधर लाकर डाला, बस ऐसे ही अकेला अकेला समय निकालता था।
बहुत हुआ तो पड़ोस के घर में आकाश के साथ खेलने कभी कभी चला जाता था। आकाश हालांकि बंटी से 3 साल बड़ा था पर वो दोनो अक्सर ludo या और कोई indoor games खेला करते थे। lockdown के समय उम्र की किसे फिक्र थी। कोई बात करने वाला या थोड़ी देर साथ बैठ खेलने वाला मिल जाए तो बड़ी बात थी।
आकाश बहुत net savvy था। कभी कभी वो बंटी को अपने साथ बिठा लैपटॉप और अपने smart phone पर बहुत से नए प्रोग्राम्स और apps के बारे में बताता था।
जब आकाश व्यस्त होता और बंटी बहुत ज्यादा बोर हो जाता तो हसरत भरी आंखे लिए कभी समर के पास तो कभी रीना के पास खड़ा हो जाता। वो 2 मिनट उससे बात करते और फिर उसको चुप करा बैठा देते थे, क्योंकि ऑफिस के काम में बाधा पड़ती थी।
“समर देखो ना बंटी ने की बोर्ड पर हाथ मार दिया, साइट ब्लॉक हो गई है। प्लीज दूसरा पासवर्ड डाल खोलने की कोशिश करो। मेरा सारा काम रुक जायेगा” अचानक रीना ने चिल्लाकर समर को बुलाया” ।
” कुछ समझ नही आ रहा बंटी का क्या करे कल उसने मेरी डायरी पर ड्राइंग कर दी। मेरी मीटिंग का पास वर्ड लिखा था, कितनी मुश्किल पड़ी मेरेको मीटिंग में शामिल होने के लिए”!
” पापा थोड़ी देर मेरे साथ खेलो ना। क्या दिन भर लैपटॉप पर बैठे रहते हो? मम्मा आप भी आओ ना मेरेको कहानी सुनाओ”।
हर थोड़ी देर के बाद बंटी जा जा कर समर रीना को यही बोल रहा था।
” समर आज मेरी 3 zoom मीटिंग है”
” रीना आज तो मेरे पूरा दिन zoom meeting में निकल जायेगा। एक के बाद एक बहुत सारी मीटिंग है”।
बंटी रोज नाश्ते की टेबल पर यही बाते सुनता था।
एक दिन समर और रीना ऑफिस का काम कर रहे थे तो अचानक उनको ईमेल का notification aaya, “bunty 25@gmail.com” से
दोनो हैरान रह गए बंटी का email notification देख कर।
उन दोनो को मालूम भी नही था की बंटी ने अपना gmail पर account भी बना रखा है।
एकदम उन्होंने बंटी की mail खोली तो एक बार फिर हैरान रह गए क्योंकि बंटी ने उनको zoom meeting join करने का invite भेजा था
Zoom meeting ID और पासवर्ड के साथ।
दोनो को समझ नही आ रहा था बंटी तो उनके साथ दिन भर रहता है फिर उसने क्यों झूम मीटिंग के लिए दोनो को बोला।
दोनो ने अपनी अपनी मीटिंग को pause किया और आकाश के घर से बंटी को बुलाया।
” बेटा हमको zoom meeting के लिए क्यों invite किया , हम तो साथ ही रहते है।”
बंटी ने बहुत मासूमियत से बोला” आपने मेरा पूरा मैसेज पढ़ा क्या”?
रीना और समर ने मीटिंग के टॉपिक को पढ़ा तो वो सकते में आ गए
मीटिंग का टॉपिक था, “mummy papa please talk to me for some time”।

आंखो में आंसू भर बंटी ने रोते हुए कहा, ” आप लोग दिन भर zoom meeting में व्यस्त रहते हो। मेरे से बात करने का या मेरे साथ खेलने का समय नहीं है आपके पास। मुझे लगा अगर मै आपको zoom meeting के लिए बोलूंगा तो आप दोनो कम से कम अपने लैपटॉप से तो मेरे से बात करोगे। आप दोनो से अपने दिल की बात करने का मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं था। आप दोनो को अपनी बात समझाने का या आपके कुछ वक्त मांगने का पासवर्ड मेरे पास नही था। इसीलिए zoom meeting का id और password भेजा”

समर और रीना दोनो को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने निश्चय किया कि वो बंटी को पूरा ध्यान देने की कोशिश करेंगे।।

गुप्त शब्द/ password/कूटशब्द

May 7, 2022

पूछते है लोग मुझे,
बदल गई कैसे? ये राज बताओ
गुमनामियों के अंधेरों में रहने वाली
डरी डरी सहमी सहमी चुपचाप कोने में छुपने वाली
कैसे अचानक थिरकने लगी
कैसे सिर उठा, बिना डरे जीने लगी
कहां से मूक शब्दो को मिली आवाज
कहां से आया ये अंदाज
कैसे आया ये बदलाव
जादुई चिराग लगा हाथ या कोई जिन्न आया
कहीं से खुश रहने का पासवर्ड चुराया
या सफलता का दरवाजा खोलने का कूटशब्द
कहीं से पाया

कैसे बताऊं आपको, कोई नही है ये राज
ना किसी ने दिया कोई गुप्तशब्द,
ना ही चुराया कोई password
बस खुद की मेहनत से अपने आप को पाया
दूसरो को कर नजरंदाज अपना आत्मबल बढ़ाया
किसी की तीखे शब्द तन को झिंझोड़ गए
वचनों के तीखे शूल दिल को घायल कर गए
हर जख्म में से आई आवाज,
उठ, जगा अपना आत्मविश्वास
अपनी लेखनी को बना अपनी तलवार
चीर डाल उन्हे, जिन्होंने किया तेरे अहम पर वार
किया खुद से एक संकल्प
कुछ कर दिखाऊंगी अपने दम पर
कठिन थी फर्श से अर्श तक पहुंचने की डगर
हजारों बाधाएं खड़ी थी सीना तान कर
अपने मनोबल को सशक्त कर,
आत्मविश्वास को बना अपना हमसफर,
आ पहुंची हूं यहां तक

कहना चाहती हूं सबसे
सफलता का गुप्त शब्द कोई दे सकता नही
खुश रहने का पासवर्ड किसी किताब या कंप्यूटर विशेषज्ञ के पास मिलेगा नही
स्वयं पर रख विश्वास , हौसलो को दे नई उड़ान
बनानी पड़ती है खुद की पहचान
अपने स्वाभिमान को रख कायम
ढूंढना पड़ता है खुद को खुद के अंदर ,

गर छुने हो नए आयाम

रंगमंच/अवस्था/चरण/

May 1, 2022

मैं हूं इस रंगमंच की सबसे बड़ी कलाकार
कभी मां, कभी बहन, कभी पत्नी
कभी अफसर तो कभी बन मुलाजिम
बखूबी निभाया हर किरदार
अपने बलबूते पर छू रही हूं आसमान
अब मेरा भी है अस्तित्व, बना रही खुद की नई पहचान

सदियों से नचाया, बना कठपुतली अपने इशारों पर
थाम मेरे जीवन की डोर, रोड़े अटकाए राहों पर
मेरी सफलता का श्रेय ले खुद सबके सामने
खड़ा किया नेपथ्य में मुझे चुप करा कर

समझ रही हूं इस मंच के कलाकारों की कुटनीतिया
उनकी छोटी सोच और हठधर्मियां
रूढ़िवादी परंपराओं का सामना करने हो गई सक्षम
विचलित होती नही देख उनका झूठा अहम
अब दुनिया के इस रंगमंच पर अपनी पहचान बना रही हूं
कठपुतली नही, बन सूत्रधार सबको अपना जौहर दिखा रही हूं

अपनी अशक्त अवस्था की थी मैं खुद जिम्मेदार
समझ खुद को अबला, मान ली थी अपनी हार
पर अब हिम्मत जुटा, किया है खुद से वादा
जीतना है इस जग को ,कर लिया है इरादा
तोड़ गुलामी की जंजीरे, अपना लोहा मनवाऊंगी
जो काम पुरुष करते आये, हर काम वो करके दिखलाऊंगी।

मत समझो मुझे निर्बल, बेबस, लाचार
सबला हूं अब इस बात का है मुझको अभिमान
जीवन के हर चरण पर अपने बलबूते
पर अपनी जगह बनाऊंगी
दुनिया के रंगमंच पर सजावट की वस्तु नहीं
संस्कृति और प्रगति की रक्षक बन दिखलाऊंगी

माना मंजिल है दूर, रास्ता है कठिन ,
पर है अब मुझको खुद पर यकीन
बन खुद निर्देशक अपने जीवन की कहानी का
इस रंगमंच पर नए आयाम बनाऊंगी

जिंदगी एक रंगमंच

April 30, 2022

“रोमाजी, आपके डैडी की रिपोर्ट्स आ गई है बहुत अफसोस के साथ आपको बता रहा हूं कि इसके अनुसार वो लास्ट स्टेज पर है। हम जो कुछ कर सकते थे, हमने कोशिश करी, अब सब कुछ भगवान के हाथो है। बस कोशिश कीजिए वो हमेशा खुश रहे, उनकी जो भी इच्छा हो वो पूरी कर सके तो करिए”।
रोमा ये सुन एक पल के लिए तो जड़ हो गई। हालांकि डैडी की हालत देख कर वो समझ चुकी थी पर जब डॉक्टर ने साफ साफ शब्दो में हकीकत बताई तो उसे धक्का लगा। अभी तक वो जो सच्चाई मानने को तैयार नहीं थी, वो रिपोर्ट और doctor के रूप में मुंह खोले सामने खड़ी थी।

डॉक्टर की बात सुनते ही उसके चेहरे पर एक अजीब सा भाव आ गया। आंखो में आंसू, चेहरे पर उदासी लेकर रोमा डॉक्टर को बोली, ” हमेशा स्टेज पर काम करने के बाद अंत में पर्दा गिरने से पहले सबकी तालियां बटोरने वाला वाला आज जिंदगी की स्टेज पर पर्दा गिरने का इंतजार कर रहा है पर अब जब पर्दा गिरेगा तब कोई तालिया नहीं बजाएगा पर सबकी आंखो में आंसू होंगे”
रोमा को याद आया कि उसके डैडी यानी कैलाशनाथ जो कि रंगमंच के एक जाने माने कलाकार थे, जिनकी आधी से ज्यादा जिंदगी स्टेज पर नाटक करने में निकली थी अक्सर राज कपूर का मशहूर गाना गुनगुनाते रहते थे, ” जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां”। पर अब तो उनके जाने का समय आ गया था।
वो ये सोच ही रही थी कि कैलाशनाथ ने पूछा” बेटा क्या सोच रही हो? मैं जानता हूं डॉक्टर ने जो कहा है। इसमें परेशान होने की क्या बात है? मेरा role इतना ही था जिंदगी के नाटक में। और देखो अभी भी मैं घूम फिर सकता हूं, सोच रहा हूं किसी नाटक में अगर एक छोटा सा भी काम मिल जाए तो मुझे बहुत खुशी मिलेगी”
“पापा आपको डर नहीं लग रहा” रोमा ने बहुत उदास होकर पूछा।
” डर कैसा बेटा, डर सिर्फ एक बार लगा था जब मां के बहुत कहने पर बचपन में पहली बार स्कूल के कविता पाठन प्रतियोगिता में भाग लिया था। मां ने बहुत प्रैक्टिस कराई थी। सच बताऊं पूरी रात सो नहीं पाया था। बहुत डरते डरते स्टेज पर खड़ा हुआ था, पैर कांप रहे थे, लग रहा था, सब मुझपर हंसने के लिए तैयार बैठे है।
स्टेज पर जाते ही मैं सब भूल गया था। कुछ याद ही नहीं आ रहा था। और मैं रोते रोते स्टेज से उतर कर मां से चिपक गया था। पर मां ने मुझे डांटा नही, नतीजे घोषित होने के बाद मुझे एक बार फिर टीचर के पास ले गई और बोली कि मुझे एक बार स्टेज पर आने का मौका वापस दिया जाए। टीचर राजी नहीं थी, पर मां ने उनसे बहुत मिन्नत की कि इसको पूरी कविता याद है, चाहे इसको इनाम नही मिला है पर आज अगर ये हिम्मत करके वापस सबके सामने खड़ा हो जायेगा तो इसका मनोबल बढ़ जाएगा। आप कृपया करके इसे सबके सामने मंच पर आकर बोलने का मौका दीजिए। टीचर के हां करते ही मां ने मुझे चूमा और कहा, जा दिखा दे सबको तू डरपोक नही है, हिम्मत से सामना कर, आज अगर तू स्टेज पर वापिस नही गया तो वापिस कभी भी नही जा पायेगा और याद रख तुझे दुनिया में अपना एक स्थान बनाना है। बस मां से हिम्मत का आशीर्वाद लेकर मैने सबके सामने पूरे हाव भाव के साथ कविता बोली और सबकी तालिया भी लूटी। बस वो दिन था और आज का दिन है मैं कभी डरा नहीं। और रंगमंच की दुनिया में एक मुकाम हासिल किया।”
” इसीलिए बेटा, जो डर गया सो मर गया” । और याद है शेक्सपियर की कविता “All the Worlds a Stage” की लाईन
All the world’s a stage,
And all the men and women merely players;
They have their exits and their entrances,
And one man in his time plays many parts
यानी पूरी दुनिया एक मंच है,और सभी पुरुष और महिलाएं केवल रंगमंच के खिलाड़ी है।
और बेटा मैंने स्टेज पर हर तरह के किरदार निभाए हैं पर आज तक बीमार आदमी का रोल नहीं मिला था। अब जिदंगी की लास्ट स्टेज पर आकर बीमार आदमी का भी रोल मिल गया। अब देखना है कि मैं इस रोल के साथ इंसाफ कर पाऊंगा या नहीं? और पर्दा गिरने पर मुझे तालिया मिलेगी या नहीं?
जैसे नाटक में मेरा जितना रोल होता है उतनी देर ही मैं स्टेज पर रहता हूं, फिर बाहर, सो जिंदगी के मंच पर जितना मेरा काम है उतना मैं करके जाऊंगा। इसीलिए दिल छोटा मत कर। बस मेरा एक काम कर दे। मेरा फोन दे, मैं अपने नाटक के निर्देशक से बात करना चाहता हूं”
” पर डैडी आपकी तबियत ठीक नहीं है आप कैसे स्टेज पर कोई किरदार निभा पाओगे, “
” बेटा मैं जानता हूं मेरी हालत के बारे । मैं इतना बेवकूफ नहीं हूं कि नाटक में किसी पात्र की एक्टिंग करू। पर मैं वहां बैठ कर अपनी टीम का हिस्सा तो बन सकता हूं। घर में सोफे पर बैठ कर सिर्फ tv देखने से तो अच्छा है मैं नाटक की रिहर्सल देखू, कुछ अपने सुझाव दे सकूं। मैने अपनी पूरी जिंदगी स्टेज पर निकाली है सो मैं चाहता हूं कि जब तक मेरे बस में है, जब तक मेरा शरीर साथ देता है मैं अपने साथियों के साथ रंगमंच का हिस्सा बन कर रहूं।”
” ठीक है पापा, आपका पूरा arrangement करा देते है ताकि आप आराम से रिहर्सल देखने जा सको। पर वादा करो कि जैसे ही आपको कुछ भी तकलीफ होगी आप एकदम घर आ जाओगे”

करीब 15 दिन के बाद अचानक रोमा को रिहर्सल रूम से फोन आया , “” रोमाजी आप जल्दी नाट्यग्रह आ जाए, आपके पिताजी स्टेज पर कुर्सी पर बैठे बैठे ही चल बसे”।

रोमा एक बार वापस जड़वत हो गई पर उसे संतोष था कि उसके डैडी की अंतिम इच्छा पूरी हो गई थी।
और जिस मंच पर उन्होंने अपने जिंदगी बिताई थी, अंतिम सांस भी वहीं ली। जिंदगी के रंगमंच से उनका पटाक्षेप उन्ही के साथियों के सामने हुआ। वाकई वे एक सच्चे अभिनेता थे जो अंत तक अपना किरदार बखूबी निभाते रहे।
और रोमा को ये पंक्तियां याद आ गई
निभा रहे है जग में सब अपना अपना किरदार
रंगमंच है दुनिया पर्दा गिरेगा आखिरकार

संतुलन और असंतुलन

April 24, 2022

विचारो की जंग से छाया अंधकार
दिल और दिमाग के बीच मचा है हाहाकार
जवाब मिल जाए कुछ सवालों का
तो आ जाए दिल को करार

संतुलन और असंतुलन की नैया फंसी मझधार
कोई तो आकर बचाए, थामे पतवार
विकट है परिस्थिति कुछ समझ ना आए
दुविधा में फंसी हूं कोई तो बताए

जिंदगी की पथरीली है राहें
कदम लड़खड़ाए तो संतुलन कैसे रहे
हंसना है जरूरी मानसिक संतुलन के लिए
अश्रु भरे नैन, दिल में दर्द होठों पर हंसी लाए कैसे?

पति पत्नी गृहस्थी की गाड़ी के दो पहिए
एक को समझ कमजोर दूसरा हरदम दबाए
गृहस्थी की गाड़ी का संतुलन रहे कैसे?

नारी सृष्टि और संस्कार की जननी है
गर्भ में कन्या भ्रूण को गिराए तो
पुरुष नारी का संतुलन संसार में बना रहे कैसे?

पेड़ पौधे पर्यावरण की शान
गर प्रगति के लिए काटे
तो प्रकृति का संतुलन कायम रहे कैसे?
चंद रुपयों के लिए शिक्षा का व्यापार करे
अध्यापक और शिष्य के रिश्ते का संतुलन कैसे रहे?

न्याय के रक्षक बन जाए मासुमो के भक्षक
तो देश में न्याय का संतुलन रहे कैसे?
देश के नेता स्वार्थ के लिए आत्मा को बेचे
तो देश की राजनीति का संतुलन रहे कैसे?

खुद की जेबें भरने दवाइयों में मिलावट करे
स्वास्थ्य का हो नुकसान,शरीर का संतुलन रहे कैसे?
धर्म के पुजारी, धर्म के नाम शोषण करे
भक्त और धर्म मे संतुलन रहे कैसे?

संतुलन और असंतुलन झूल रहे तराजू में
कभी इसका पड़ला भारी कभी उसका भारी
संतुलन बना रहे आओ मिल करे कुछ चमत्कार
यही जीवन का है सार