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शून्य का चक्कर

September 19, 2021

शून्य भाव से बैठ सोचती हूं अक्सर
ये दुनिया है सिर्फ शून्य का चक्कर
शून्य से शुरू होकर शून्य में खो जाते है
बीच में भी शून्य के ही भंवर में गोते खाते हैं

शून्य जिसका नही है कुछ मतलब
लेकिन गजब है इसकी ताक़त
किसी भी अंक के साथ लगा
बढ़ा सकते है उसकी क़ीमत

तिरस्कार की नजरो से देखा जाता
जबकि जिंदगी इसके बिना चलती नही
जितना शून्य बढ़ाते जाओ बढ़ जाती है शान
फिर भी शून्य की नही खुद की कोई पहचान
शून्य शब्द से कर सकते किसी का भी अपमान
शुन्यो को गिन दे सकते है किसी को भी मान

शून्य कहो, सिफर कहो या कहो जीरो
इनके चक्कर में फंस
कितने जीरो को बनता देखा हीरो
और कितने हीरो बन गए जीरो
गजब है इनका खेला
इस गोले में फंस हर कोई दुनियादारी को है भुला

शून्य का है हर जगह बोलबाला
शून्य के फेर में लग जाता सबके मुंह पर ताला
क्या इसकी महिमा सुनाए, क्या इसके गुण गाए
आमदनी में शून्य बढ़ाने लोगो ने
कितने ही पहाड़ उठाए

सरकारी दफ्तरों में कागज पर ही रह जाती
कितनी योजनाएं
नतीजा मिलता शून्य पर अफसरों के घर बन जाते

नेताओ का तो है शून्य इष्टदेवता
शून्य बैंक बैलेंस के साथ राजनीति में आते
देश और समाज को शुन्य बनाते
पर खुद के खाते में अंको के आगे शून्य बढ़ाते

किस किस की बात करे,
किस किस का ले नाम
सब है फंसे शुन्य के चक्रव्यूह में
निकलने का नहीं है कोई उपाय

शून्य में है दुनिया समायी, शून्य से है संसार
शून्य ही है ज्ञान , शून्य ही है विज्ञान का आधार
शून्य से होती गिनती, शून्य से होता दूरी का हिसाब
शून्य से ही तो है हमारी विश्व में पहचान

शून्य सिखाता है ये पाठ
गर पाना हो जग में नाम और मान
और बनाना हो समाज में अपना स्थान
रहो ना तन्हा, चलो लेकर औरों को साथ
करो व्यवहार शून्य के जैसा
जो है नाकारा, अकेला बिना मोल
पर मिलकर दूसरे के साथ बढ़ा देता उसका मोल
बन जाओ शून्य जैसे , दूसरे तुम्हारे साथ को तरसे।

शून्य भेदभाव दिवस – Zero Discrimination Day

September 18, 2021

रूपा अपने बेटे की स्कूल assignment के लिए International days की जानकारी इकट्ठी कर रही थी।
Google search करते हुए अचानक उसका ध्यान Zero Discrimination International Day पर पड़ा और वो हैरान रह गई। ऐसा भी कोई दिन होता है क्या? आज तक तो कभी सुना भी नही था।
फिर उसने पढ़ा तो मालूम पड़ा कि
“विश्व स्तर पर 1 मार्च को शून्य भेदभाव दिवस (Zero Discrimination Day) मनाया जाता है. ये दिन महिलाओं और लड़कियों के साथ भेदभाव और असमानता को चुनौती देने के लिए मनाया जाता है। इस दिन को मनाए जाने का उद्देश्य बगैर किसी विकल्प के महिलाओं व लड़कियों को सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में बराबरी के अवसर के लिए आवाज उठाना है.
और 2021 के जीरो डिस्क्रिमिनेशन डे के थीम UNAIDS द्वारा आय, लिंग, आयु, स्वास्थ्य की स्थिति, व्यवसाय, विकलांगता, यौन उत्पीङन, नशीली दवाओं के उपयोग, लिंग पहचान, जाति, वर्ग, जातीयता और धार्मिक आधार पर असमानताओं को समाप्त करने के लिए तत्काल कार्रवाई करने की आवश्यकता पर रखी गई है.”

पढ़ते पढ़ते वो सोच में पड़ गई।
क्या ऐसा संभव है?
क्या ऐसा हो सकता है कि हमारी समाज भेदभाव रहित हो जाए? महिलाओं को उनका उचित हक मिल जाय, उनको पुरुषों के समान अधिकार मिल जाए? क्या ऐसा हो सकता है कि इस तरह का दिन मना कर लोगों में जागरूकता आ जाए और आपसी भेदभाव दूर हो जाए, हर इंसान चाहे वो विकलांग हो या पिछड़ी जाति का हो, किसी छूत की बीमारी से ग्रसित हो, या यौन उत्पीडित हो सबको समान के अधिकार मिलें?
क्या यह दिन मनाने से हिंजडो को समान अधिकार मिल जायेंगे?
क्या पूरे विश्व में एक दिन को भेदभाव रहित घोषित करने से नारी आत्मसम्मान के साथ सिर उठा कर जी सकती है?
क्यों पहले समाज से भेदभाव दूर करने के लिए कदम नहीं उठाए गए?
पर चलो देर आए दुरस्त आए।
शायद अब सब इज्जत के साथ जी सकेंगे।

ये सब सोचते सोचते उसे याद आया कैसे उसकी मां ने गांव की औरतों के साथ मिल कर नारी सम्मान की लड़ाई लड़ी थी और समाज में नारी को एक स्थान दिलाया था।
उस वक्त तो शून्य भेदभाव दिवस के बारे में कोई जानता नही था।


पर उसकी मां ने शून्य शब्द से किए गए खुद के अपमान को एक चुनौती की तरह लिया था और अपने लिए कहे गए शून्य की गाली को सिर माथे स्वीकार कर शून्य के आगे अपने आत्मसम्मान और दृढ़ निश्चय को खड़ा कर शून्य को एक नया ही स्थान दिया था।

बात तब की है जब वो 3 या 4 क्लास में पढ़ती थी।
एक दिन गांव में उसके पिताजी ने सरेआम उसकी मां का अपमान किया था क्योंकि मां पढ़ी लिखी नही थी और घर के व्यापार के बारे में मां ने अपनी राय दी थी, जिसको सुनकर पिताजी के अहम को ठेस पहुंची थी ।
रूपा को अभी भी याद है कैसे घर के नौकरों के सामने पिताजी ने मां को कहा था, ” अनपढ़ औरत, हजार में कितने जीरो लगते है, तेरेको ये भी नही मालूम, तू खुद जीरो है, और मुझे सलाह देने चली है, तू एक शून्य के बराबर है , तेरा कोई मोल नहीं है, क्या औकात है तेरी मेरे सामने आवाज उठाने की”? और उंगली के इशारे से एक बड़ा सा सिफर / शून्य यानी जीरो मां के सामने बनाया था।

मां चुपचाप मुंह नीचे करके चली गई और मन ही मन रोते हुए अपने रोज के कार्यों में लग गई।
बस उसी दिन मां ने निश्चय कर लिया था कि कुछ भी हो जाए वो अपने बच्चो को बहुत पढ़ाएगी , खासकर के अपनी बेटी को ताकि कोई भी उसे जीरो कहने का साहस न कर सके। और वो खुद भी
बच्चो के साथ साथ पढ़ेगी और सबको दिखा देगी कि उसका भी कुछ मोल है, वो शून्य की तरह बेकार नहीं है।
रूपा को अभी भी याद है मां घर का काम करते करते जमीन पर कोयले से लिखने की कोशिश करती थी। कभी गेहूं साफ करते हुए उंगली से नंबर लिखती थी तो कभी उपले बनाते हुए गोबर में उंगली फिराती थी।
उसकी लगन देखकर गांव के प्राइमरी विद्यालय की अध्यापिका ने सब महिलाओं की क्लास लेने का निश्चय किया।
मां और पड़ोस की औरते दिन में कपड़ो पर रंगीन धागों से बेल बूटे बना कर अपना समय काटती थी।
मां ने खुद पढ़ाई करने के साथ साथ अपने आस पड़ोस को औरतों को समझाया कि अगर औरत पढ़ी लिखी हो तो अपने बच्चो का बराबर खयाल रख सकती है, उनके सपने पूरा करने में मदद कर सकती है और सबसे बड़ी बात कोई भी पति अपनी पत्नी को अनपढ़ बोल कर अपमान नही कर सकता। मां की बातो को सुनकर और खुद उसको पढ़ने की कोशिश करते देख पड़ोस की औरतों ने भी हामी भर दी।
और सब मिल कर दुपहर में कढ़ाई के साथ साथ लिखना पढ़ना भी सीखने लगी।
अध्यापिका गांव की औरतों के बने हुए कढ़ाई किए हुए कपड़ो को देख बहुत प्रभावित हुई थी
और उसने सुझाव दिया की सब औरते मिल कर एक व्यापार शुरू कर सकती है । थोड़ी मुश्किलों का सामना कर गांव की औरतों ने शहर के हस्तकर्घा उद्योग के दफ्तर में अर्जी दी और अंत में सबने मिल कर अपना बनाया सामान शहर में बेचना शुरू किया । देखते ही देखते सब औरते आत्मनिर्भर हो गई ।
स्थानीय अखबार और टीवी वालो ने जब आकर मां और उनके साथ काम करने वाली सब औरतों का इंटरव्यू लिया तो पिताजी को बहुत गर्व महसूस हुआ।
पर पुरुष का अहम तो सूरज चांद की तरह स्थाई है। कुछ भी हो जाए वो तो अडिग रहता है।
मां की सफलता का श्रेय भी पिताजी ने अपने सिर लिया और बोले, ” तुझे जीरो से हीरो बनाने में मेरा ही हाथ है। अगर उस दिन मैं तेरे पर नही चिल्लाता तो कैसे तू इतना आगे बढ़ती। और अगर हम सब मर्द तुमको इज़ाजत नही देते पढ़ने की या व्यापार करने की तो क्या तुम यहां तक पहुंच पाती?”
मां ने धीरे से मुस्करा कर यही कहा “आज मैं हजार और दस हजार में कितने जीरो लगते है वो भी बता सकती हूं और गिन कर भी बता सकती हूं और कमा भी सकती हूं। ये सब आप के ही कारण संभव हुआ है। इसका सेहरा आप ही पहने।

उसने दिखा दिया था कि इंसान अगर ठान ले तो कुछ भी कर सकता है सिर्फ हिम्मत और लगन होनी चाहिए।
रूपा देर तक शून्य में नजर गड़ाए अपनी मां को मन ही मन धन्यवाद दे रही थी जिसके अथक परिश्रम , लगन और दृढ़ निश्चय के कारण आज वो खुद भी आत्मनिर्भर थी।

वो ये भी जानती है की साल में सिर्फ एक दिन शून्य भेदभाव दिवस (Zero Discrimination Day) मनाने से समाज और लोगो के विचारो में बदलाव नहीं आयेगा।
इसके लिए जरूरी है अपने दैनिक जीवन में से भेदभाव को निकालना, हर इंसान की इज्जत करना और उचित अधिकार देना। जब तक इंसान अपनी सोच नहीं बदलेगा तब तक ऐसे शून्य भेदभाव दिवस (Zero Discrimination Day) मनाने से कुछ क्रांतिकारी बदलाव नहीं आएगा।

स्याही की आत्मकथा

September 12, 2021


मैं हूं स्याही, जिसे आप सब ink के नाम से जानते है ।
वैसे तो मेरा इस्तेमाल लोग अपनी खुद की या दूसरों की कहानी लिखने के लिए करते है।
पर आज सुनिए मेरी खुद की कहानी, मेरी जुबानी। संक्षिप्त में ही कहूंगी अपनी आत्मकथा।
वैसे तो मेरे दिल में बहुत दर्द भरे है, बताने बैठूंगी तो कागज कम पड़ जाएंगे और आप भी बोर हो जायेंगे
इसीलिए थोड़े में ही या यूं कहिए गागर में सागर भरने का प्रयास करूंगी।
मेरा इस्तमाल तो सदियों से होता आ रहा है।
हमारे पुराणों में लिखा है कि ब्रह्माजी स्वर्ग में बैठ पंख वाली कलम को मुझ में डूबो डूबो कर सबका भाग्य लिखते है।
हो सकता है आजकल शायद कम्प्यूटर के जमाने में में मुझ में कलम डूबो कर नही लिखते होंगे, पर कंप्यूटर से printout निकालने के लिए मेरी आज की नई पीढ़ी यानी new generation की स्याही का प्रयोग कर रहे होंगे। कंप्यूटर की ink भी तो मेरा ही टुकड़ा है।

मैं समय के साथ चलना जानती हूं।समय के साथ साथ मेरे रूप और रंग में भी परिवर्तन हुआ है।
पुरातन काल में तो मुझे बनाने के लिए वनस्पति यानी फूल पत्तियों का प्रयोग करते थे।
पर आज के युग में तो तरह तरह के रसायन को मिलाकर मेरा रूप परिवर्तन किया जा रहा है।
कभी तरल तो कभी gel की तरह मुझे हर तरह की कलम में भरा जाता है।

समय के अनुसार कलम का भी रूप बदलता जा रहा है।तरह तरह के रंग और डिजाइन वाली कलम/pen में जब मुझे भरते है तो मुझे अपने पर गर्व महसूस होता है।

किसी जमाने में बच्चे मुझे एक कांच की बोतल में भरकर स्कूल लेकर जाते थे और अक्सर मुझे अपने कपड़ों पर गिराकर ही वापिस आते थे।
सच बताऊं क्या दिन थे वो, बच्चे आपसी झगड़े में मुझे एक दूसरे पर फेंक कपड़े और मुंह खराब करते थे। मुझे बहुत मजा आता था, ऐसे खेल खेलने पर
वो बात अलग है घर आने पर मेरे नाम पर बेचारे बच्चों को बहुत डांटा जाता था।
क्योंकि मेरे लगाए हुए दाग इतनी आसानी से पहले भी नही निकलते थे और अभी भी आसानी से नही निकलते है।

बहुत से साबुन की कंपनियां मेरे दाग मिटाने के दावा कर कर अपना सामान दुगने, चौगुने भाव पर बेच लाखो का मुनाफा कमाते हैं। मैं यही सोच खुश हो जाती हूं कि चलो मेरे कारण किसीको तो फायदा हो रहा है।

नवजात शिशु के जन्म के 6 दिन के बाद भाग्य लिखने की प्रथा में बच्चे के पास मुझे, मेरे साथी कलम और कागज के साथ रख कर जो सम्मान दिया जाता है वो तो बयान ही नही कर सकती।

दशहरे की पूजा हो या दिवाली में चोपड़ा पूजन, सरस्वती पूजा हो या फिर शादी में आने का न्योता देने के कार्ड लिखना ही, हर समय मुझे मान सम्मान दिया जाता है तो मेरा सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है।

हां जब कोर्ट में फांसी की सजा सुनाते समय जज उस मेरे से भरी हुई कलम को ही तोड़ देते है तो मेरा रोम रोम रोता है।

जब मुझ से भरी कलम डॉक्टर के हाथ मे होती है। तो वे मरीज को ठीक करने की औषधि देकर व्यक्ति की जान बचाने की कोशिश करते है तो मुझे अपना जीवन सार्थक लगता है कि चलो मैने भी कुछ पुण्य का काम किया।

हर दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए मेरा इस्तेमाल होता है।कलम में मुझे भर स हर बच्चा अपना अध्ययन का कार्य करता है। कलम से ही शिक्षक बच्चो अध्यापन कराते है।

मुझे कोई अफसोस नहीं है आजकल मुझे कलम में भर कर प्रयोग करने का चलन नही रहा है। पर ये तो देश की प्रगति और उन्नति की निशानी है
मुझे तो मेरा आधुनिक रूप यानी कंप्यूटर के प्रिंटर की ink भी बहुत प्रिय है।

भारत के लोकतंत्र मे लोगों को अपनी आवाज उठाने की, बोलने की और विरोध प्रदर्शन की आजादी देता है और लोग विरोध के नए-नए तरीके खोज लाते हैं. कभी विरोध में अंडे, टमाटर फेंके जाते हैं, तो कभी जूते-चप्पल.कभी सारे आम गाली दी जाती है पर बेइज्जती करने के इस बढ़ते क्रम में ‘मुंह काला करना’ करना शायद सबसे बड़ा तरीका बनता जा रहा है।
अब स्याही, विरोध की नई आवाज बनकर सामने आ रही है.
पत्रकार मेरा सहारा लेकर कागज के पन्ने काले कर रहे है, या सोशल मीडिया पर रोज कीचड़ उछाल रहे है और तो और अपना विरोध जताने के लिए भ्रष्ट नेताओ पर स्याही फेंक रहे है।
कहते है कलम की धार तलवार की धार से कम नहीं होती है। पर कलम मे मुझे ही तो भरा जाता है
मेरे बिना कलम की क्या बिसात है।

शायराना अंदाज में कहूं तो

मेरा है अलग अंदाज
ध्यान से बिखेरो तो बन जाऊ अल्फाज
नही तो बन जाऊ दाग
वैसे अपने में अकेले है नही कोई मेरी पहचान
कलम के साथ मिल ला सकती हूं तूफान
सच तो है कलम का भी
खुद का ही नही कोई अस्तित्व
मेरे साथ मिलकर ही सार्थक है उसका जीवन
हम दोनों है एक दूसरे के पूरक
पर फिर भी कलम की ही होती जयजयकार
कलम में जान देने वाले की
यानी मेरी सुनता नहीं कोई पुकार

अजब है मेरी कहानी
लेखक के विचारों के साथ बहती हूं
जरूरत से ज्यादा कहीं गिर जाऊं
हिकारत की नजर से जाती हूं देख
जी हां मै ही हो वो स्याही
जिसका रूप है बदला वक्त के साथ
नही बदली तो मेरी फितरत
भावनाओं को शब्दो में पिरो कर
देकर एक नया रूप लाती हूं दुनिया के सामने
समय के साथ बदल बदल कर अपना साथी( कलम) निभा रही हूं अपना फर्ज
मदद करती हूं जो भी लिख कर
करना चाहता है अपने भावों की अभिव्यक्ति
दौड़ती रहती हूं कभी पंख, कभी बांस की डंडी
कभी लकड़ी ,कभी प्लास्टिक
तो कभी metal की रगों में
गिरती हूं जब कागज के पन्नो पर तो रचती हूं एक नया इतिहास
गलती से भी मेरा उड़ाना नही उपहास
देखा नहीं रौद्र रूप तुमने मेरा।
बिखर जाऊ तो कर दूं सब सत्यानास
मेरा उद्देश्य तो लोगो की मदद करना है,
चाहे कैसे भी मेरा उपयोग करो।
बस आधुनिकता के जोश में मुझे भूल न जाना।

अब आप बताओ कैसे लगी आपको मेरी आत्मकथा ?

मेरी कलम की स्याही

September 12, 2021

सब कहते है मेरी कलम की स्याही हो गई है गाढ़ी
जुबान नही दिखती थी कभी जिसकी
कैसे बोलने लगी है हमेशा चुप रहने वाली ?
सोच नही सकती थी जो
आंख झुकाए रहती थी जो
कैसे सिर उठा डोलने लगी है वो?
क्या आता था इसको लिखना पढ़ना?
क्या आता था इसको कलम को स्याही में डुबोना?
कैसे सीख ली दुनियादारी?
कैसे इसकी लेखनी हो गई है क्रांतिकारी?

क्या जवाब दूं किसीको इसका?
कैसे बताऊं दिल के राज?
एक दिन तो घाव बनने थे नासूर
एक दिन तो झलकना था सब्र का प्याला

तड़पती थी देख कर कमजोर मासूमों पर अन्याय
मन ही मन घुटती थी ,आती ना लब पर आह
बच्चों का शोषण, नारी की लाचारी
देश रक्षकों की मनमानी नेताओं की चोरी
जुटा ना पाती थी हिम्मत उठाने की आवाज

फिर एक दिन उगा नया सूरज
नई सुबह से साथ हुआ मुझे एहसास
क्या बिन कुछ कहे सुने चली जाऊंगी मैं?
गर मांगेगा खुदा लेखा झोका मेरी हस्ती का
क्या सिर्फ चुप रह जाऊंगी मैं?

आया नया जोश, आई जान में जान
मिल गए मेरे दर्द को अल्फाज
अब कागज के कोरे पन्ने भीगने लगे है
मेरी स्याही के आंसू से
मेरी आत्मा के टीस देने वाले घाव
मोहताज नही रहे किसी दवा के
शब्दो का मलहम लगा उन्हें सुखाना
सीख लिया अब मैने
शब्दो की कटार से जालिमो का सीना
भेदने लगी हूं मै
कलम की सूई में स्याही का धागा पिरो
समाज के जख्मों को सीने लगी हूं
हां अब मैं चुप नही रहती
क्योंकि बोलना सीख लिया है मैने

INK

September 11, 2021

The ink stains on any cloth can be easily removed with the help of a stain remover but there are many stains that are not so forgiving. They stay on with faint impressions of their existence. Some memories stick. No matter how hard you try to wash them, overwrite them – they linger somewhere in the folds of our memories. Surfacing when you least expect them to and sometimes sticking around like a constant unwanted throbbing companion.

Renu has come a long way since the schooling days. A woman at a high point in her career, mother of two beautiful children and a loving wife. A life that women in her social circles envy secretly and yearn for. No one can see through the scars that are buried deep inside her. They haunt her at unexpected times – riding the train, teaching her children, window shopping, hosting parties for their friends, visiting a stationary shop

The memories of school hold a different place in her life than what the other kids usually reminisce of.

She was excited like any ten year old to be entering a new class. New friends, old pals, new teachers, so much to learn. As classes progressed, Renu found Mr. Surana, her math teacher taking much interest in her grades. Renu was filled with gratitude for a teacher to help her with personal attention to enable her score higher. The teacher offered to help with advanced math; he said he saw a lot of potential in her. Renu was elated and in huge admiration for her teacher. Having a mentor who helps you achieve your goals is known to be a blessing. Mr. Surana found ways to call Renu in his office in lieu of coaching her. He found ways to touch her hands, brush against her body. Terrified and burdened under the authority of her teacher, she trembled but was to scared to speak.

Once he even pressed her budding breasts and pressed against her. She tried to push him back and while doing so, she dropped an ink bottle which was on his table on her school unifrom
When her mother asked her how she had spoilt her uniform, she just kept quiet. She was too scared to tell her mother how her uniform had got so many ink stains.
This incident had left a deep mark on her heart and mind. She stopped using her ink pen because in her subconscious mind ink was related to Mr Surana.

These perverted acts of Mr Surana continued for some time. She was becoming quieter day by day and used to dread when he used to call her to his room but she did not know how to stop his advances

Renu stopped taking interest in maths. She recoiled in a shell unbeknownst to her friends. Her grades started dropping.

She had started feeling guilty and ashamed of herself. She thought that maybe she has done something that is why Mr Surana is punishing her like this. She used to start shivering as soon he entered the classroom.

She became silent, withdrew from friends, was prone to panic attacks and outbursts of rage, yet nobody connected the dots. She was too shy to share this with her mother also. Her mother took her change in behaviour as age related mood swings so did not pay much attention to it

Shoma, her class teacher noticed her falling grades and also sensed her change of behaviour. One day she called her to her room and after a lot of coaxing; Renu started crying and revealed her inner fears and the behaviour of the Maths teacher.

Shoma could understand Renu’s fear as she herself along with other lady teachers had been on the receiving end of Mr Surana’s advances but they could resist his behaviour. The teacher was shocked to know that since none of the lady teachers fell prey to his lecherous acts, he had turned towards small innocent girls who were not aware of how such lewd men behave and how they use these innocent girls to satisfy his perverted libido.

She along with other teachers gathered courage and went to the Principal and complained against the teacher. The Principal could not believe that under his very eyes and in his own staff he had a mentally sick person who was torturing the young girls and the teachers by his lustful behaviour. Finally with the help of the trustees the teacher was suspended.

But this incident had left such a mark in the young mind of Renu that she had started fearing all men and boys.

When the time came for her college admission, she was not ready to go to a coeducation college rather opted for an all-girls college where she would feel secure and safe.

Even in college when all her friends talked about boyfriends, their crushes , shared incidents of how the boys were flirting with them and also shared juicy stories of their dates with boys, Renu used to remain quiet and show no interest in her friends’ talks. Her friends were not aware of her fears, her wounds in her heart and mind had become scars and were tormenting her day in and day out. Unaware of the turmoil in Renu’s mind her friends used to make fun of her and called her old fashioned , backward behanji, and a phattu. They could not understand why Renu was not enjoying the golden era of her teens.

Later she reluctantly joined an Institute for her professional course where she had boys as her classmates and men as lecturers. She was still apprehensive of interacting with her teachers and classmates. But as the saying goes, time heals all wounds; she became a little free in her approach and seeing the friendly attitude of everyone around her she overcame some of her fears.

But the bad experience and the sexual abuse she had suffered in her childhood still gave her nightmares.

Later, like a fairy tale she met an understanding partner Ramesh and she slowly opened up to him and he helped her overcome her fears. And she felt loved, safe and free of her shame and guilt. He helped her come out of her self-made cocoon.

Now she has become a school counselor as she does not want other young girls to suffer the way she had suffered. She believes that if she can save even one girl from going through what she went through and if she can help her get over the traumatic experience then her suffering, her pain was worth it

She makes it a point to explain the intricacies of life to young girls, warns them about the ways of some men and how to prevent them from getting victimized.

But even now there are times she gets nightmares about that particular incident and at times mere sight of a ink bottle or an ink fountainpen sends chills down her spine.

Ramesh jokingly told her one day, ” Thank God for the invention of Gel pens and the school authorities who have permitted gel pens in the schools.What would you have done if our kids had to use ink pens”.

How she wishes that the way her mother had thrown that ink stained uniform, some miracle may happen and help her erase the scars of that incident from her subconscious mind.

जंगल

September 5, 2021

Posting some realtime pictures along with

जवाहर के जंगल के अनदेखे अनछुए अद्भुत
रूप को देख, हो गई हूं मैं स्तब्ध
कैसे करू बयान मिल नही रहे शब्द
ये शांति, ये सुकून, पंछियों की चहचहाट
हरियाली की चूनर ओढ़े यौवन का श्रृंगार किए
जंगल की यह मोहमोहनी छटा
अंगड़ाई लेते वृक्ष, बादलों से घिरा आसमान
वर्षा के बीच अचानक निकला ये इंद्रधनुष
खींच रहा मुझे अपनी ओर
अरण्य के नैसर्गिक सौंदर्य का कर रसपान
मानो इस शरीर में आई एक नई जान
सोच रही हुं क्या आकर बस जाऊं यहां?
छोड़ अपने घर के ऐशो आराम
फिर बजी फोन की घंटी
और याद आया अपना परिवार और जिम्मेदारी
कैसे बस जाऊ यहां तज के दुनियादारी?

पर भर का था बसेरा यहां
चल अंजू वापिस लौट चल , जहां है तेरा जहां
सपनो से भी सुंदर इस छवि
को छोड़ जाने का है नही दिल
सुनहरी यादें बसाए लौट चले हैं मुसाफिर

इस वन की अनूठी सुंदरता का कर रसपान
मन में आए अनेक विचार
क्या हो सकती है
मुंबई के कंक्रीट के जंगल और
इस प्राकृतिक जंगल के बीच में कोई तुलना
इधर उधर नजर घुमा ,
दिल के तारों को झनझना कर देखा
पर सच में कुछ समझ न आया
दोनों ही तो है जंगल

एक ईंट गारे की गगनचुंबी इमारतो का
तो एक लकड़ी के तनों और पतियो से घिरा
जंगली जानवर का खौफ यहां
भ्रष्टाचारी ,चोरों का दबदबा वहां

जंगली जानवर नोच करते शिकार यहां
मादाभक्षी नर करते एक दूसरे की चीर फाड़ वहां
यहां कोहरे और बादल से है सब ढका हुआ
वहां है प्रदूषण की चादर में सब लिपटा हुआ

दिन के उजाले में भी है अंधेरा छाया यहां
भ्रष्टाचार, चोरी चकारी का है अंधकार वहां
यहां है झर झर गिरते झरनों का शीतल पानी
वहां भी तो गटर नाली का कीचड़ करता
हर जगह मनमानी

हर कदम है यहां गिरने का डर
वहां भी तो चलना पड़ता संभल संभल कर
दोनों जगह ही होती ताकतवर की जय जयकार
मासूम कमजोर ही सुनता नहीं कोई हाहाकार

घना भयावह जंगल बांध लेता अपने अनगढ़ आकर्षण की जादुई डोर में
मुंबई भी देकर लालच बांधता सबको अपने आलिंगन में
नतीजा यही निकाला कुछ देर घूम कर
दोनो में कोई खास फरक आता नहीं नजर

फिर सोचा क्यूं भाग कर आते सब यहां?
हमसे भी ज्यादा खुश नजर आए इंसान यहां
अनपढ़ ,गरीब, चिथड़ो में लिपटे आदिवासी
घास फूस की झोपड़ी में रहने वालो ने किया
हाथ हिला मुस्करा किया स्वागत हमारा
कीचड़ में खेलते देख बच्चो की खुशी सोचा
महंगे से महंगे खिलौने भी न दे पाएंगे ये मजा
एक अजब सुकून, प्यार मिला यहां
जो लाखो खर्च करने पर भी न मिलता वहां

हम कितने स्वार्थी है ये भी पता चला आकर यहां
डैम के गिरते पानी में जाकर आनंद लेने के लिए
पकड़ा था जिस आदिवासी का पल्ला
क्या कभी हिम्मत करती जाकर बैठ उसके पास
अगर होता नही पानी में फिसलने का एहसास

पर यही तो है जिंदगी का सार
काम पड़ने पर बनाते है गधे को भी बाप
फिर यहां तो बचानी थी अपनी जान
इसीलिए कसकर थामा था उस मैले कुचले का हाथ

अब वापिस लौट कर करना है एक और काम
सबकी रचनाओं को पढ़ देना है इनाम
है प्रभु देना इतनी शक्ति कर पाऊं इंसाफ
कुछ गलती हो जाए तो कर देना माफ

शुक्रवार का इंतजार

August 28, 2021


सप्ताह के 5 दिन कैसे भी निकालती थी वो
कभी हंस कर तो कभी रोकर दिन काटती थी वो
सबकी मदद को रहती हमेशा तैयार
वृद्धाश्रम के हर काम करने में होशियार
कभी किसी को हाथ से खाना खिलाती
कभी किसी का कंधा सहलाती

पर हर शुक्रवार सुबह से बैठ जाती
अपना पोटला बांध
हर आने जाने वाले को रोक बताती
बेटे ने किया था वादा मेरा हाथ थाम
लेने आऊंगा हर शुक्रवार की शाम
3 दिन रहेंगे साथ, छोड़ जाऊंगा वापिस सोमवार
मां, हम दोनो रहते नही घर दिन भर
तू घर में अकेली हो जायेगी परेशान
तेरी है फिक्र मुझको,तेरा ही भला हूं सोचता
तुझे अकेला नहीं छोड़ सकता
यहां आश्रम में हमउम्र के बीच कट जायेगा समय
सब रखेंगे तेरा ध्यान
ये बोल बेटा छोड़ गया यहां एक दिन
आएगा लेने वो शुक्रवार की शाम
इसी आस में बैठी रहती दिल को थाम

कितने महीने बीत गए
न आया वो बेटा और ना आई वो शाम
हर शुक्रवार की रात मुरझा जाती
शनिवार इस आस में निकालती
शायद आएगा आज के दिन
रविवार पूरा रोकर निकालती
सोमवार को फिर उस खास शुक्रवार
के इंतजार में काम पर लग जाती

वृद्धाश्रम के संगी साथी थे भुक्तभोगी, मजबूर
कैसे समझाए उस नादान को
जानते थे जो यहां छोड़ जाते
यहां करके अपने से दूर
वो लौट के फिर नही आते
अच्छा है खुद भी जाओ उनको भूल
शुरू करो एक नई जिंदगी, खुद पर कर विश्वास
ना रहो किसी के भरोसे ना रखो कोई भी आस

एक खास Friday

August 27, 2021

रेखा बहुत दिनों से सोच रही थी कि सतीश को कहे कि इस वीकेंड उसको बाहर घुमाने ले जाए।।
“पूरा सप्ताह घर में पिसती रहती हूं, रसोई , राशन, सब्जी, धोबी, बाई, बैंक के काम, छोटी जूही की nanny का supervision, इन सबमें समय ही नही मिलता कहीं घूमने जाने का। बस कल friday को नाश्ते के समय सबको बता दूंगी कि शनिवार को अपनी बहन के घर जाऊंगी, रात वहां रुकूंगी, रविवार को सतीश को बोलूंगी मेरेको वहां से आकर ले ले, फिर shopping करने जायेंगे और बाहर ही खाना खाकर आयेंगे”।
मन ही मन weekend का प्रोग्राम बनाते हुए रेखा रोजमर्रा के काम में व्यस्त हो गई।
शाम को ऑफिस से आते ही सीमा ने अपना पर्स सोफे पर फेंका और बोली ,” mom बहुत थक गई हुं। ये पूरा week बहुत tiring रहा। बस कल friday और फिर weekend। पूरा weekend सिर्फ आराम करुंगी।
रेखा ने मुस्करा कर सीमा को जवाब दिया, हां बेटा, जानती हूं पूरे दिन ऑफिस के काम में बहुत थकान हो जाती है” ।
Friday की सुबह सबको ऑफिस भागने की जल्दी देख रेखा ने सोचा शाम को सबको अपना प्रोग्राम बता दूंगी। टेबल पर नाश्ता लगाते हुए रेखा ये सोच ही रही थी कि उसका बेटा सूरज बोला,” mom, आज शाम को हम दोनो का खाना मत बनवाना, आज फ्राइडे नाइट है, कल ऑफिस की छुट्टी है, सुबह जल्दी उठने का कोई tension नहीं हैं सो हम ऑफिस से सीधे फ्रेंड के घर जायेंगे। कल छुट्टी है सो देर रात तक वहीं रहेंगे। आप दोनो आराम से सो जाना फिकर ना करना”।

सीमा ने भी यह सुनकर अपना weekend का प्रोग्राम बता दिया ,” finally weekend आया, कल तो देर से उठेंगे, सोच रही हूं कल parlour जाकर hair cut करा लूं, और मेरी पूरी अलमारी बिखरी हुई है, सो Sunday को वोही काम कर लूंगी”।

इतने में उसके पति सतीश जो अपने दोस्त से फोन पर बात करने में व्यस्त थे, टेबल पर आकर बैठे और रेखा को बोले, ” रेखा सन्डे को मेरे 3 -4 दोस्त खाने पर आएंगे, कब से वो तुम्हारे हाथ की दाल बाटी खाने को बोल रहे थे, सो तुम बना लेना।”
“और सुनो , आज तो friday night है।
शाम को पड़ोस वाले शर्माजी के घर फ्रेंड्स इकट्ठा होकर ताश खेलेंगे। शर्माजी की पत्नी मायके गई है , सब दोस्त मिलकर थोड़ा enjoy करेगें, तुम ऐसा करना शाम को थोड़े पकोड़े बना कर उनके घर भेज देना। खाना हम लोग बाहर से ऑर्डर कर लेंगे”।

“ये हवा हो गया मेरा प्रोग्राम”। सबके जाने के बाद रेखा गुमसुम सी सोच रही थी कि क्या Friday night और वीकेंड नौकरी करने वालो के लिए ही होते है? क्या Housewives के लिए सब दिन एक समान होते है?
पर कुछ पल में ही मां की ममता और पत्नी का फर्ज उसकी खुद की इच्छाओं पर हावी हो गया और वो अपनी नाराजगी को भूल घर समेटने में लग गई।
Friday night के बाद वीकेंड भी निकल गया, और वापिस सोमवार को सबका रोजमर्रा का routine शुरू हो गया।
और फिर एक और Friday और weekend आ गया।
Friday की सुबह चाय पीते हुए बहू सीमा ने अचानक आकर कहा, ” mom आंखे बंद करो” और उसके हाथ में एक लिफाफा रख दिया
रेखा ने जब वो लिफाफा खोला तो हैरान रह गई देखकर कि वो किसी resort की booking confirmation थी? उसे कुछ समझ नही आया और उसने हैरत भरी नजरों से सबको देखा ।
सूरज अपनी कुर्सी से उठा, मां के गले में हाथ डाल कर बोला, ” मां ये आपके और पापा के लिए वीकेंड पर रिजॉर्ट बुकिंग की रसीद है”
सीमा भी बहुत प्यार से रेखा के हाथ में एक bag पकड़ाते हुए बोली
“इस वीकेंड पर आप और पापा दोनो इस रिजॉर्ट जा रहे हो। पापा Monday की छुट्टी ले रहे है
बस आज शाम ऑफिस से आकर आपकी पैकिंग मैं करूंगी, जो मैं बोलूंगी वो ड्रेसेज लेकर जाना।
“और इस bag में आपके लिए दो नई कुर्ती है, आप वो ही साथ में लेकर जाना”।
रेखा आंखो में आंसू लिए हक्की बक्की चुपचाप हाथ में पकड़े bag को देख रही थी।
बेटे ने आगे बढ कर मां के आंसू पोंछे और कहा,” मां हम जानते है आप पूरा week घर संभालती हो, आप भी घर बैठे bore हो जाती हो और जैसे पूरे सप्ताह काम करने के बाद Friday nite, weekend celebrations और relaxation पर हमारा हक है वैसे ही आपका भी है”।
“बस हम सबने निष्चय किया है कि हर महीने एक पूरा weekend आपके नाम। घर की जिम्मेदारियों से आपकी छुट्टी।आप जो चाहो वो करना । पापा ने भी हां बोला है”।

सबके जाने के बाद रेखा बहुत देर तक Resort booking की रसीद और सीमा का दिया हुआ bag हाथ में लिए और चेहरे पर मुस्कराहट लिए बैठी रही।
तभी सतीश ने आकर हंसते हुए कहा, ” मैडम, एक कप चाय और मिलेगी क्या? या बाहर से मंगवाऊ?
इस हिंदी सीरियल के पुराने चुटकले को सुन रेखा खिलखिला कर हंसते हुए चाय बनाने चली गई।
इस बार का Friday कुछ खास ही खुशियां लेकर आया था उसके लिए।

खास हो तुम

August 22, 2021

माँं मेरा है एक सपना
बनाए कोई मुझे अपना
बेटी ने माँं के गले लगके कहा
आकर कोई कहे मेरे कानो के पास
एक सुंदर सा एहसास हो तुम
मेरे लिए खास हो तुम

कोई अपना आकर कहे
सूरज की लाली हो तुम,
सुबह की मुस्कान हो तुम
चांद सी शीतलता है तुमसे,
जीवन का उजियारा है तुमसे
जीने की आस हो तुम
मेरे लिए खास हो तुम

माँं बताओ, क्या कोई चुपके से आकर मुझे कहेगा?
मेरे दिल की धड़कन हो तुम
मेरी सांसों की महक हो तुम
मेरा विश्वास हो तुम
मेरे लिए खास हो तुम

माँं थी चुप, कैसे समझाए नादान बेटी को
हर सपना होता नही पूरा
उसने खुद भी कभी देखा था ऐसा ही एक सपना
जो जिंदगी की दौड़ में रह गया अधूरा।
अब तो घर परिवार में बसे हैं उसके प्राण
बच्चे और पति बन गए हैं उसके लिए खास
अपना जीवन कर दिया है उनके नाम
पर सुनने को अभी भी तरसते हैं उसके कान
अभी भी है उसको ये आस
शायद हो जाए किसी को ये एहसास
और कोई आकर चुपके से कहे
तुम हो मेरे लिए खास

बेटी का सपना ना पूरा होने पर
कहीं दिल ना टूट जाए
इसीलिए बैठ समझाया उसे
भगवान की खास रचना हो तुम
इस धरा की जननी हो तुम
तुम्हारे हाथ में लिखी है समाज की रचना
सृष्टी ने तुम्हे खुद सृष्टी होने का वरदान दिया
यह बात है सबसे खास, इसे कभी नही भूलना

तुम अपना मूल्य जानो,
अपनी काबिलियतो को पहचानो,
क्यों सिर्फ किसी एक की बनना चाहती हो खास
करो कुछ ऐसा काम , पूरे जहान में हो तुम्हारा नाम
दूसरो के लिए बनो एक मिसाल
खुद पर हमेशा रखना विश्वास
कोई कहे ना कहे पर याद रखना
तुमसा कोई दूसरा नहीं
तुम हो अनमोल , तुम हो खास

A Special God/ Worship place for women

August 21, 2021

This is a fun post written in a light mood so requesting all special men and women members of this group to please take it in the right spirit. My intention is not to hurt anyone’s religious values, sentiments or criticize any religion.
I am a God fearing , God loving person and have no special favourites amongst Gods.
I respect and believe in all religions , their preachings and their respective divine powers.
I just want to share my musings regarding biased attitude of some of our religious practices against women.

Few months B.C ( Before Corona) I had visited a temple after travelling for almost 8- 9 hours by car and was very excited to do the darshan and offer my prayers to a famous , much worshipped and powerful deity.
After reaching there I was mesmerised by the place.the loud chantings of sholkas, saffron cladded priests, innumerable shops selling floral garlands and various other materials for offering to the deity. I was engulfed by the magical aura of the place and was very happy.
I thanked my stars and felt fortunate to have touched the ground of such a pious place.
With great faith and happiness I entered the temple premises .
But to my surprise, I saw a huge crowd of woman encircling the platform where the deity was placed. I could only see men on the platform performing the religious rituals.
I was in for a shock when I was told that I cannot climb up the platform and offer my prayers , rather I would have to stand around the raised platform and just observe the men doing the puja from a distance. I can’t even touch the stairs of the stage but I can stand inside the fenced gallery and offer my prayers and all this for what??
Because I am a woman. The men of our group were not only permitted to go inside, but also allowed to offer prayers, whereas the women in our group were asked to stand outside and pray.
I know this was not a stray case . I had read about these sort of practices in quite a fee famous pilgrimage places but never expected that I would be subjected to this prejudicial practice.

I was on the verge of crying as I felt helpless and wondered what is so special about male genders that they are given preferential treatment in the house of God .

There are many religious places ( in all religions) where entry of women is forbidden. They have to stand in separate halls and do darshan from there.
They cannot enter the premises and even if they did, they could only enter the main area but not enter the inner sanctum, where the actual idols are placed. They cannot touch the idols .

In some special places , women after puberty till menopausal stage are not allowed inside the premises.

In most of the sacred places , menstruating women are denied entry because they will contaminate the sanctity of the place. Really???
Do women really become dirty, impure during those special days ?
Aren’t these days most important in the life of a woman or for the procreation of human race

In some religions, there are a few mantras that are only meant for men, women can not recite them .
I remember reading somewhere that amongst some religious sects, women are not allowed to recite Gayatri Mantra as it will make them more powerful than men and they will start dominating over them. ????

These biased rituals, beliefs and values have always infuriated me as if we women are suffering from some contagious disease and our entry or touching God may violate and infect the idols.
I fail to understand why women are treated as outcasts or untouchables? Whereas the fact remains that we women, are the creators of mankind.
We carry these so-called special superior human beings called as men in our wombs, endure the highest form of pain in giving birth to them, feed and nurture them and help them grow into adult men, only to be shunned by them and treated as some parasites.

And the best part is that women cannot touch the idols of male Gods but they are even stopped from entering the temples of women Gods or Devi during their menstruation cycle.
A devi or goddess is afterall a woman herself with all feminine traits then why are women stopped from going near the temples of Goddesses??
But these special species of men Pujaris can give baths and even change the clothes of all Goddesses.
Funny isn’t it?

So I often used to think why not have a Special God or worship place exclusively for women – a God to whom a woman in distress can turn to.
An Exclusive God ,who will cater only to women, where they will be treated with respect and without any discrimination.
A God in whose temple men will be treated as trespassers and who will be prosecuted if they try to enter the temple.

A god who will listen to the problems of women only ,without any prejudice.
A God ,who will come to the rescue of women who are either the victim of exploitation by men/ women or who are subjected to humiliation and insults by this super special species of mankind, the Men.

A God who will not get polluted or whose temple will not become dirty by the entry of women.

A special worship place where women will not be denied entry, will be treated with respect and will not be forced to stand out .

And I used to pray : Mr GOD , are you listening to me? Please give special attention to my plea and come to the rescue of us, and do something to restore our dignity and let us walk with our heads high in the society”.

“When all religious scriptures, say that for you (God) all your children are equal and there is no discrimination on the basis of sex. You do not have favourites amongst different sex. Men or women , all have a special place in your heart. Then why is there different rules for men and women?. Hey God ,
Do somthing, show your magical powers”.

It is rightly said ,” Bhagwan ke ghar der hai andher nahi.
May be the supreme power could feel and understand the feelings of woman so he showered his blessing in the form of a news article which I came across one day. And it read as:
“5 Women’s-Only Temples In India Where Men Are Not Allowed.”

I jumped so high with joy and excitement that if it was possible then I could have touched the sky and gone to the abode of God and hugged him for finally listening to my prayers and overruling the dominance of men in the management of all religious places and finally giving women the power to say NO to men and not allowing them in some temples .

One more thing which was satisfying to my woman ego after reading the news was that although a few temples were devoted to goddesses , a few had Male God as main deity and the women could do puja, offer prayers and touch the idols.

These temples are specially for women where men are either not allowed at all . Or atleast on some days reserved for women only.
The customs and traditions forbid the entry of men and instead welcome women to worship the deity and take part in the puja proceedings.

I have nothing against any religion, any religious values or beliefs but I sincerly think that when our constitution has granted equality on the basis of sex then why there should be discriminaiton between sexes in practicing religion .

The Almighty does not differentiate between sexes when it comes to sharing of sun, moon and air then how we, his offsprings can stop anyone from benefiting from His blessings.

Each one of us is special for God, we all are His special creations, then who are we to discriminate and stop anyone from offering prayers to Him. He rules the world and all men and women are part of His world equally.

Anju Gandhi

Reunion of freedom Fighters

August 15, 2021

हमारे स्वंत्रता सेनानी जिन्होंने
जान की बाजी लगा देश को आजादी दिलाई
एक दिन स्वर्ग में सबके दिमाग में
भारत की धरती पर घूमने का खयाल आया
तो freedom fighters reunion का प्लान बनाया

देश की 75वी आजादी की सालगिरह मनाएंगे
पुराने दिनों को याद कर घूमेंगे, फिरेंगे,
देश के कोने कोने का चक्कर लगा
सुनहरी यादें सहेज वापिस आयेंगे
15अगस्त 2021 को धरती पर आने के लिए
अनुमति ले भगवान का वाहन बुक कराया

आते आते ऊपर से देखा
मंदिर में बजते घंटे, मस्जिद की अजान
जंगल, खेत, खलिहान
लाल किले पर फहराता देख झंडा
इंडिया गेट की बरकरार है शान
सब कुछ पहले सा है सोच चेहरे पर आई मुस्कान

धरती पर आकर उनका सिर चकराया
सब कुछ बदला बदला नजर आया
कहीं पर भी कुछ पुराना, अपना सा नजर ना आया
सब घूम रहे अपने में मग्न
मेहमानो के स्वागत को कोई न आया
हर कदम पर इंसानों की भीड़ देख मन घबराया
” हम जब गए थे तब तो इतने लोग नहीं थे
ये हुजूम कहां से आया”

क्यों सब चेहरे पर कपड़ा बांधे घूम रहे समझ न आया
पहले इज्जत देने को नारी ढकती थी सिर
पर शायद अब दूसरो को इज्जत देने को
सब को ढकना पड़ता नाक और मुंह
सोच आगे कदम बढ़ाया
तभी पुलिस ने रोका और पूछा
किधर है तुमलोगो का मास्क? चलो भरो जुर्माना
भूल गए मास्क है जरूरी, गया नही अभी कोरॉना
माफी मांग, पुलिस का दिया मास्क लगाया
याद आया स्वर्ग में सुना था एक बार ,
धरती पर हुआ नया बदलाव, आया है एक दानव
कर रहा जो तांडव, कांप रहे सब थर थर
पुलिस की कर्मठता देख दिल हुआ उनका खुश

हर कोई घूम रहा हाथो में छोटा सा डिब्बा उठाए
कभी कान में लगाए कभी नीचे देख नजर गड़ाए
हिम्मत कर किसी से पूछा भैया क्या है इस डिब्बे में
उसने इनको घूर के देख पूछा जंगल से आए क्या?
मोबाइल फोन कहते इसको, दुनिया में कही भी किसी को देख जान सकते संसार का हाल
विज्ञान के इस करिश्में को देख इनका मन हर्षाया

कहीं गगनचुंबी इमारते कहीं आधुनिक कारखाने
हवा से तेज दौड़ती मेट्रो, लंबे लंबे फ्लाईओवर,
बड़ी बड़ी गाड़ियों का सड़को पर मेला
नए आविष्कार, टेलीविजन, कंप्यूटर , इंटरनेट ,
देश की देख ये प्रगति गर्व से सीना फुलाया

भूख लगने पर पहुंचे एक होटल के अंदर
तरह तरह से विदेसी पकवान देख मुंह में पानी आया
खाना ऑर्डर कर टेबल पर पड़े अखबार को उठाया
समाचार पढ़ चक्कर आया, ये कैसा आया बदलाव

हर जगह धर्म जाति के नाम के दंगे
पहले थे सिर्फ भारत के 2 टुकड़े,
अब प्रांत प्रांत में झगड़े
जाते थे पहले जेल में चोर डाकू,
अब पहुंच गए कानून के रक्षक
नेता हो गए भ्रष्टाचारी, धर्म गुरु हो गए भक्षक
आतंक का है बोलबाला,
जनता के मुंह पर लग गया ताला
नारी की हया लुप्त हो गई, आंखो की शर्म मानो मर गई
बुजर्गो की करते नही कोई इज्जत
बच्चो का होता है शोषण
ये मेरे देश की हो गई क्या हालत हो गई भगवान
क्यों बदल गया इंसान

ये सब देख सुन, प्रगतिशील बदलाव को कर सलाम
दुखकारी परिवर्तन से आंखे चुरा
वापिस जाने को बढ़ाए कदम
देश की तकनीकी उन्नति का मनाए जश्न
या देश को टूटते देख छलकाए नयन?
देश की तरक्की से हो गर्वित
या देखे देश का आत्मिक पतन?
समझ नही आया उनको
मातृभूमि की रज लगा माथे
सिर झुका नमन कर भारत माता को
वीर सेनानी लौट गए अपनी स्वर्ग की नगरी

जाकर भेजा देशवासियों को sms
परिवर्तन प्रकृति का ये नियम
दोनों हाथो से करो इसका आलिंगन
बदलने के चक्कर में न भूलो अपने संस्कार
भारतीय हो करो देश और देशवासियों का सम्मान

अपने को बदलो

August 14, 2021

सोमा बालकनी में आराम कुर्सी पर बैठ कर बिना पत्तों के पेड़ के तने को देखते हुए खयालो में खोई हुई सोच रही थी कि उसकी खुद की जिंदगी और इस पेड़ में कोई फरक नही है।
जैसे पेड़ पर समय समय पर नए पत्ते आते है,इसका रूप बदलते है फिर झड़ जाते है पर ये तना ठूंठ की तरह सालो साल खड़ा ही रहता है नए पत्तो के आने के इंतजार में।
शायद उसी तरह वो भी उम्र के हर पड़ाव पर खुद को बदलती रहती है पर उसका मन और इच्छाएं वैसे की वैसे ही बनी रहती है सुनहरी दिनों के आने की तलाश में जब कोई उसको बदलने को नही बोलेगा, जब वो खुद अपनी मन की मर्जी करेगी।

सोचते सोचते वो पुराने दिनों की यादों में खो गई।

बचपन से वो एक ही बात सुनती आई थी, “अपने को बदलो”।
बालपन में मां हमेशा कहती थी क्या लड़कों की तरह उछलती कूदती रहती हो?, अपने आप को बदलो, बड़ी हो रही हो, ठीक से उठना बैठना सीखो।
पता नही मां ,भाई को क्यों नही बदलने की शिक्षा देती थी कि बड़े हो रहे हो अपने को बदलो?
थोड़ी और बड़ी हुई तो घर के बड़े बुजर्गो ने कहना शुरू कर दिया, अपने आप को बदलो, व्यवहार में गंभीरता लाओ, कल को दूसरे के घर जाना है, क्या हमारी नाक कटाओगी?
दूसरे के घर जाने के डर से वो सहम सी जाती और अपने में सिमट जाती।
उसे याद आया कि कितनी बहस करती थी वो सबसे कि नए घर जाकर सिर्फ वो क्यों बदले, क्यों नहीं दूसरे घर वाले भी थोड़ा बदले?
शादी के बाद विदाई के समय डैडी ने बहुत प्यार से समझाया बेटा अपने आप को बदल कर नए घर के परिवेश में ढाल लेना। वहां हर परिस्थिति में adjust करने की कोशिश करना।
और एक आज्ञाकारी बेटी की तरह सिर झुका
बेटी से बहु का रूप बदल और नए परिवार के अनुसार अपने आपको बदलने का वादा कर उसने नई जिंदगी की शुरुआत करी थी।

धीरे धीरे अपने आप को उसने अपने पति और ससुराल वालो की मर्जी के मुताबिक बदलना शुरू कर दिया था
सोमा को याद आया कैसे उसे चटकीले, रंग बिरंगे कपड़े पहनने का शौक था पर क्योंकि उसके पति को pastel रंग पसंद थे तो उसने अपनी पसंद को भुला धीरे धीरे अपने पति की पसंद के रंग पहनने शुरू कर दिए थे।
हर कदम पर उसने अपनी पसंद को नजरंदाज कर पति की पसंद को अपनाया था। मानो उसकी खुद की पसंद की कुछ अहमियत नहीं थी।
इंसान जब सोचने पर बैठता है तो प्याज की अनगिनत परतों की तरह यादों की भी परत के बाद परत खुलती जाती है
बस सोमा के साथ भी यही हो रहा था।
एक के बाद एक बाते याद आती जा रही थी उसको।

घर में एक बार सास से कुछ कहा सुनी होने पर पति ने कहा था,” देखो माँ की उम्र हो गई है, उनसे उम्मीद मत करना की वो अब अपनी सोच बदलेंगी, वो कहां बदलेंगी अब, तुम ही कोशिश करो अपना व्यवहार बदलने की, थोड़ा एडजस्ट कर लो।
और वो एक बार फिर अपने अहम, और स्वाभिमान को दबा adjust करने की कोशिश में लग गई थी।
घर के हर सदस्य को खुश करने के लिए उसने हर कदम पर अपनी भावनाओं को दबा, सपनो को मार
समझोता करने की कोशिश करी थी।

कभी कभी वो यही सोचती थी की शायद कभी ऐसा समय आएगा की कोई उसकी पसंद को मान्यता दे खुद को उसके अनुसार बदलेगा। शायद जब वो जब वो उम्र के एक नए मुकाम पर पहुंचेगी तो कोई उसको बदलने को नही बोलेगा और दूसरे लोग उसके अनुसार अपने को ढाल लेंगे।

सोमा को अचानक याद आया कैसे उसके दोनो बच्चो ने एक दिन कहा था, मम्मी, जमाना बदल रहा है, अपनी सोच बदलो, आपके वाला समय नही रहा है, please move with times।
mom please change your thinking, do not be so old fashioned।
और उसने कोशिश शुरू कर दी थी, अपने बच्चो के अनुसार अपने को ढालने की, वो नही चाहती थी की उसके बच्चो के दोस्तो के सामने वो एक traditional, रूढ़िवादी मां के रूप में आए।
“Mom आप क्या हमेशा dull colour की saree pehnti ho? Bright colours की कुर्ती पहना करो। Let’s go and change your wardrobe” और इस बार उसने अपने बच्चो की पसंद को ध्यान रख कपड़े पहनना शुरू कर दिया।
उसे याद नहीं आ रहा था कि आखिरी बार कब उसने अपनी पसंद के कपड़े पहने थे।
कभी पति कभी बच्चों की पसंद से जीते जीते वो अपना अस्तित्व भूल गई थी।

एक दिन उसके पति ने उसे कहा था, ” fight for your rights. इतना दब्बू। मत बनो, जवाब देना सीखो”। और जब उसने कोशिश करी थी किसी बात पर अपनी राय देने की, पति के गलत attitude के खिलाफ अपनी आवाज उठाने की तो उसको सुनना पड़ा था,” तुम बहुत बदल गई हो, पहले वाली सोमा और अभी की सोमा में जमीन आसमान का फरक है”
“कोशिश करो अपने को बदलने की”

सोमा ये सोच ही रही थी की उसकी कुछ सहेलियां वहां आई और बातो ही बातो में उन्होंने सोमा को समझाया, ” सोमा अब वक्त बदल गया है, घर में शांति रखनी हो तो अपने आप को बहू के हिसाब से ढाल लेना”,।
और हैरानी तो तब हुई जब उसके पति ने भी इस नई सोच में हां में हां मिलाई और वो बोले “समय के साथ चलना, अब पुराने ढंग नही चलेंगे, खुद को ही नए खून के हिसाब से चलना पड़ेगा। तो बेहतरी इसी में है अपने आप को बदल लो”।
और सोमा जोर से हंस पड़ी थी ये सुनकर और बोली थी ,” आप कितना बदल गए हो। कभी आपने मुझे मेरी सास के अनुसार बदलने को बोला था और आज आप मुझे बहू के अनुसार बदलने को बोल रहे हो”?

पति बेचारे खिसिया कर धीरे से मुस्करा कर बोले,” प्रिय वक्त के साथ बदलने में ही समझदारी है”।

सोमा सोच में पड़ गई कि क्या उसको ही हमेशा अपने को बदल कर समझोता करना पड़ेगा? क्यों एक बेटी, एक पत्नी,एक मां को ही दूसरो की खुशी के लिए जीना
पड़ता है?
क्यों एक औरत ही हमेशा अपने सपनो को मार ,अपनी पसंद को दबा, अपनी इच्छाओं की बलि चढ़ा सबकी खुशी के कारण अपने आप को बदलती रहे?
क्या कभी ऐसा दिन भी आएगा जब कोई उसकी इच्छाओं, उसकी उम्मीदों का मान रख अपने को बदलेगा?

किस्मत का है बोलबाला बाकी सबका मुंह काला

August 8, 2021

99% मेहनत और 1% luck
पर ये 1% ले जाता है बाजी मार
कितनी भी कर लो मेहनत
गर किस्मत साथ ना दे तो मिलती है हार
हर शुभ काम के पहले कह बेस्ट ऑफ़ लक
पहनाते है किस्मत के सिर सफलता का ताज
अक्सर देखा परिश्रम करने वालो को
नकारो के हाथो खाते मात

olympics में जी तोड़ मेहनत करता है हर खिलाड़ी
पर गोल्ड मेडल का होता विजेता
तकदीर साथ देती जिसका
हारने वाले की मेहनत में कमी न थी
फिर भी मिली सूक्ष्म सेकंड से हार
वो कैसे सहन करे किस्मत की मार
सर्वोच्च अंक पाने वालो के हाथो छीन जाता मौका
रिश्वत देने वाले बढ़ आगे मार देते है चौका

हर कोई आता है लिखा कर अपनी तकदीर
होगा वोही जो लिखा है हाथो की लकीरों को मंजूर
बिना मेहनत नही होगी पूरी मन की ईच्छा
पर तकदीर देगी मौका तभी मेहनत से मिलेगी सफलता

हर काम होता भगवान की मर्जी से
वरना क्यों कोई जन्म लेता झोपड़ी में
और कोई खेलता महलों में
झोपड़ी से महल का सफर तय हो सकता मेहनत से
पर ये भी होगा मुमकिन नसीब के इशारों से

परिश्रम से मिलेगी सफलता
हाथ पर हाथ धर बैठने से कुछ नही मिलता
पर जब तक लगेगा नही किस्मत का धक्का
मेहनत करने के लिए नही मिलेगा मौका

सोचती हूं कैसा होगा भगवान का कंप्यूटर?
जिसमें सदियों से भरा है
हर जीवित प्राणी की किस्मत का रजिस्टर
कितना GB Ram होगा कितने होंगे फोल्डर?
क्या नाम होंगे files के, क्या होगा criteria?
कैसे होता होगा किस्मत का वितरण,
कितना लगता होगा समय लिखने में ?
कैसे होता होगा चयन?

काश मिल जाए ऐसा hacker
जो crack कर सके भगवान का कंप्यूटर
देकर उसको रिश्वत ,बन कर स्वार्थी
करा सकूं delete कुछ अपनों के फोल्डर्स
रख सिर्फ सुख, सफलता, शांति, समृद्धि
करा दूं गायब दुख ,नाकामयाबी जिंदगी से
पर ये भी होगा मुमकिन गर लिखा होगा किस्मत में

किस्मत पर बहस

August 7, 2021

” दादी आप भाभी और उनके नन्हे बच्चे के पास ये कागज़ और पेन क्यों रख रही हो, और आंखे बंद कर क्या बोल रही हो?” 15 साल की राधा ने अपनी दादी से पूछा
” बेटा जन्म लेने के ६ दिन बाद भगवान आकर किस्मत लिखते है इसीलिए ये कागज और पेन रखा है भगवान के लिए और आँख बंद कर भगवान से प्रार्थना कर रही हूँ की बच्चे की अच्छी किस्मत लिखे”, दादी ने राधा को समझाया
” तो क्या मेरी, आपकी, सबकी किस्मत भगवान ने लिखी है”?
” हाँ बेटा जो कुछ भी अपनी जिंदगी में होता है वो भगवान द्वारा लिखी किस्मत के कारण ही होता है”
” तो दादी किस्मत ही सब कुछ है? जो होना है, जो हमे मिलना है वो सब किस्मत पर ही निर्भर है”?
” नहीं बेटा सिर्फ किस्मत काम नहीं करती, किस्मत के साथ हमारी मेहनत , हमारा जोश, हमारी भावना और हमारा प्रयास भी मायने रखता है”, “
” तो दादी, अगर मेहनत मायने रखती है तो हम लोग तो कितनी मेहनत करते है, पिताजी दिन रात काम करते है, माँ भी दिन भर घर का और दुसरो की घर जाकर काम करती है, तब भी हम लोग गरीब है, पर वो सामने वाले घर की आंटी तो दिन भर घर में रहती है, कुछ काम नहीं करती फिर भी उनके घर कितना पैसा है, जबकि हमारे घर तो हमेशा पैसे के नाम के झगडे होते है. “
“लेकिन किस्मत सिर्फ उसी का साथ देती है, जो अपनी किस्मत खुद मेहनत से बनाता है” दादी ने फिर समझाया।
राधा तो मानो आज बहस करने के लिए ही बैठी थी, वो हार मानने को तैयार ही नहीं थी।
” दादी एक बात बताओ, अपने चाचा की जुड़वा बेटियां है, दोनो सुंदर है, एक बराबर पढ़ाई करी है दोनो ने, दोनो के exam में एक से नंबर आते थे पर एक की शादी कितने अमीर परिवार में हुई है और दूसरी एक middle class family में गई है। जब उनकी शादी हुई थी तब आपने ही कहा था की दोनो की किस्मत कितनी अलग अलग है। तो बोलो इसमें परिश्रम का सवाल ही नही पैदा हुआ, सब किस्मत का खेल हुआ ना?”

” और दादी वो पड़ोस वाला चौकीदार , कितनी मेहनत करता था पर उसकी नौकरी चली गई, तब भी आपने कहा था बेचारे की किस्मत खराब है”
” अच्छा बताओ भुवा के पति की इतनी कम उम्र में मृत्यु हो गई तब भी आपने कहा था बेचारी की किस्मत खराब है।”
” बेटा अपने कर्मो का भी फल मिलता है” दादी धीरे से बोली।
राधा को लग रहा था की दादी के पास उसकी बातों का कोई जवाब नहीं है तो भी दादी को छेड़ने के लिए राधा ने फिर अपने मुंह खोला:
“दादी एक बात और, ये भी तो हो सकता है ना , कि किस्मत में लिखा हो तभी इंसान परिश्रम करता हो, अगर किस्मत में लिखा हो की ये इंसान मेहनत नही करेगा तो वो नही करेगा।”
“अगर किस्मत में लिखा है की वो इंसान मेहनत करेगा तभी उसे सफलता मिलेगी तभी वो मेहनत करेगा।
कोई अमीर के घर पैदा होता है, कोई गरीब के घर।
इसीलिए दादी मुझे तो लगता है की सब कुछ किस्मत में लिखा है, जैसे हम दोनो की किस्मत में लिखा था की आज हमारी बहस होगी।”
” चल भाग यहां से, मेरा दिमाग मत खराब कर” कह कर दादी ने राधा को भगा दिया।
” दादी ये भी किस्मत में लिखा था कि आपके पास मेरी किसी बात का जवाब नहीं होगा और आप मुझे भगा दोगी” कह राधा दादी से लिपटते हुए बोली और फिर हंसते हुए वहां से चली गई।

मैं , मेरे वो और kill word

August 1, 2021

मुझे देख चुपचाप और सोच में बैठी पहली बार
मेरे वो घबरा कर बोले क्या हो गया आज
मैने धीरे से दिल का राज बताया
Friday word kill में क्या लिखूं
कुछ समझ नहीं आ रहा
हंसते हुए वो बोले, हैरानी की है बात?
जिसने मुझे 40 साल पहले अपनी अदाओं से मारा
जिसने नैनो के तीर चला कलेजा चीर डाला
जो आज भी अपनी तीखी वाणी से देती है मार
उसको kill/ मारना शब्द पर लिखना नहीं आ रहा?

मैने गुस्से से उनको घूरा
नैनो से तीर की बजाय आग का गोला छोड़ा
धीरे से वो बोले wow!!
If looks could kill ,i would be dead by now

फिर मस्का लगाते हुए बोले
तुमने अपने सपने मार, बच्चो का भविष्य बनाया
अपनी इच्छाओं को मार ,मेरे परिवार को संभाला।
अपनी आकांक्षाओं को मार, मेरा जीवन संवारा
अपना पुरा जीवन तुमने हमारे नाम किया।
सच्चाई इतनी तुम में
अपनी आत्मा को मार कोई काम किया नही तुमने।
ये बात अलग है एक मच्छर तक मार नही सकती तुम
कॉक्रोच को मारना दूर, उसे देख घबराती हो तुम
तुम तो घर की शान हो, हमारा अभिमान हो
तुमसा दूसरा कोई नहीं
तुम्हारे लिए kill शब्द पर लिखना मुश्किल नहीं

लगता है तुम्हे भी कुछ समझ नहीं आ रहा
इसीलिए तो to kill time,
अपनी मीठी बातों से उलझा रहे हो
कह कर हमने उन्हें अपना गुस्सा दिखाया

अपनी killer मुस्कराहट बिखेरते हुए
हमारे उन्होंने धीरे से हमें समझाया
प्रिय ये दुनिया है दोगली
जिसे मारना है उसे छोड़ देते है
जिसे जिंदा रखना है उसे मार देते है।
बैठो मेरे पास , समझता हूं तुम्हे

अहम, द्वेष, वैर सबको मार कर जीना चाहिए
पर हम अपनाते है इन्हे,
अपने जीवन का हिस्सा बना लेते है इन्हे
लड़किया संसार की जननी है,
जिनके कोख से पुरुष लेता है जन्म
उसको ही मां के गर्भ में मार देते है लोग
अगर लड़किया ही नही होंगी तो
संसार चलेगा कैसे, कोई सोचता नहीं

आगे सुनो
आजाद देश के हम है वासी
एक समान अधिकार हमारे,
एक समान जीने का हक सबका
फिर भी honour killing के है हजारों किस्से
कहीं जाति के नाम पर देते है मासूमों को मार
तो कहीं धर्म के नाम पर होते प्रहार
कही प्रांत प्रांत के नामपर है हाहाकार
तो कहीं अंधविश्वास और रूढ़ियां देती हैं मार

मार डालती पेट की भूख किसी को
तो पैसे की भूख ने छोड़ा नहीं किसी को
किसी को अकेलेपन ने मारा
तो किसी को भीड़ ने निगला
आम आदमी महंगाई के हाथो मारा जाता
किसान ओलो की मार से घबरा जाता।

कोई मार कर फांसी चढ़ गया
तो कोई मार कर तमगा पा गया
दुश्मनों को मार सैनिक देश बचाते
जमीर को मार नेता नाम कमाते

कहीं कोई कड़वे बोलो से मारता
तो कोई मीठे कटाक्षो से काटता
कोई तिल तिल के है मारता
तो कोई कहींअपनी उम्मीदों के हाथ मारा जाता

रुको, इतने समझदार हो आप, आज मैने जाना
Kill शब्द पर आपके विचारो ने कर दिया मुझे दीवाना
बस करो पतिदेव, बंद करो ज्ञान देना
समझ गई हुं क्या है लिखना
जरा अपने विचारो को दो लगाम
कहीं ऐसा न हो इतनी गहरी बाते सुन हो जाऊ बेहोश
और सब कहे देखो पति ने पत्नी को
मार डाला मार डाला

मैंने मार डाला

July 31, 2021

मेरी बाई उषा रोज काम करने के बाद चाय पीते हुए आस पास की सब खबरें बताती है। उसको मेरे घर में चलता फिरता newpaper /radio कहते हैं ।
दोपहर में मैं जब भी फ्री होती हूँ तो to kill my time उसकी बातें सुनने बैठ जाती हूँ ।
कुछ दिन पहले जब वो गांव से वापिस आयी तो हमेशा चहकने वाली उषा बहुत उदास बैठी थी। जब मैंने कारण पूछा तो रोते रोते उसने उसकी चचेरी बहिन जो की गाँव में रहती थी उसकी कहानी सुनाई ।
” मेरी बहन को पुलिस पकड़ कर ले गयी, क्यूंकि उसने अपने आदमी को मार डाला और वो चिल्ला चिल्ला कर एक ही बात कह रही थी “हाँ मैंने उसे मार डाला, और मुझे कोई अफ़सोस नहीं है कि मैंने उसे मार दिया, वो इसी लायक था।
उषा ने जो बताया उसको सुन कर मेरे भी रौंगटे खड़े हो गए
और मुझे एक बार फिर एहसास हुआ की औरत की हालत गाँव में अभी भी बहुत दयनीय है और सबसे बड़ी बात है कि औरत ही औरत की दुश्मन है. औरत पर अत्याचार औरत ही करती है। कितने शर्म की बात है बेटा न पैदा होने की सूरत में औरत को कितनी यातना सहनी पड़ती है।
और सबसे बड़ी बात जो हमेशा मेरा खून खौला देती है वो है बाल शोषण, वो भी बाप के द्वारा खुद की बेटी के साथ ।
उषा ने बताया उसके बहिन लीला के शादी से पहले हर लड़की की तरह सपने थे की उसे ससुराल में बहुत प्यार मिलेगा, इज़्ज़त मिलेगी। पर ऐसा कुछ हुआ नहीं।
उसकी शादी 20 साल पहले रमेश से हुई थी. शादी के बाद से ही वो शराब के नशे में उसको मारता था वो चुपचाप उसकी मार सहती थी क्यूंकि उसकी माँ ने शादी के वक्त उसे कह दिया था कि शादी का मतलब सहना होता है, चाहे कुछ हो जाये, पति जैसे भी रखे, उसे वहीं उसी के घर रहना होगा ।
इसीलिए अपने माँ बाप की कुछ नहीं बताती थी चुपचाप मार खाती रही और अपने सपनों को टूटते देखती रही।
अपनी सब इच्छाओँ को मार मन ही मन घुटती रही
एक साल के बाद उसको बेटी पैदा हुई पर उसके ससुराल वालो को तो बेटा चाहिए था , तो उन्होंने उसको बहुत कोसा और मारा भी ,जैसे की ये उसकी गलती थी की उसे लड़की पैदा हुई थी पर बेचारी लीला के हाथ में तो कुछ नहीं था।
एक साल के बाद जब वो दोबारा प्रेग्नेंट हुई तो तीसरे महीने ही उसकी सास ने जाकर उसकी जांच कराई और जैसे ही मालूम पड़ा की दूसरी भी बेटी है, उसे कुछ पाउडर खिला कर उसका गर्भपात करा दिया और उसकी लड़की को इस दुनिया में आने से पहले ही मार दिया ।
लड़के की चाह में हर साल उसकी जांच कराते और गर्भ में लड़की है जान कर उसको गिरा देते ऐसा २-३ बार होने के बाद उसको लड़का पैदा हुआ।
हमे लगा था की अब उसकी हालत ठीक हो जायेगी और उसेथोड़ी इज़्ज़त मिलेगी ।
पर ऐसा कुछ नहीं हुआ उसका पति उसको अभी भी बहुत मारता था ।
उसकी लड़की १२ साल की हो गयी थी।
एक बार जब किसी शादी में लीला मिली तो वो और उसकी लड़की बहुत सहमे सहमे और बीमार लग रहे थे.।
उस समय तो लीला ने कुछ नहीं बताया पर जब इस बार उषा गांव गयी तो उसे मालूम पड़ा की लीला का पति उसकी खुद की लड़की के साथ छेड़कानी करता था उसकी लड़की ने जब लीला को बताया तो लीला को विश्वास नहीं हुआ और उसने अपनी लड़की को ही डांटा की उसको शायद कुछ गलत फहमी हुई है
पर एक बार अचानक लीला ने अपने पति को रंगे हाथों पकड़ लिया पर तब उसके पति ने लीला को ही बहुत मारा और कोई उसको बचाने भी नहीं आया।
पर अब शायद लीला के सब्र का प्याला भर चूका था इसीलिए जब एक रात उसका पति अपनी बेटी के पास गया तो लीला ने कुल्हाड़ी उठा अपने पति के सिर पर मार दिया ।
बाद में उसने खुद ही चिल्ला चिल्ला कर सबको इकट्ठा किया और अपने पति की करतूत सबको बताई और सिर्फ एक ही बात बोलती रही मैंने उसको मार कर सजा दे दी है ।
लीला के बच्चों को उनके नाना नानी अपने घर ले गए है ।
उषा के जाने के बाद मैं यही सोचती रही कि
क्यों माँ बाप ऐसी गलत शिक्षा देते है की तकलीफ सहना, मुँह न खोलना ?
क्यों अपनी समाज में अभी भी लड़की का पैदा होना अभिशाप माना जाता है ?
क्यों औरत को अपने सपनों को मार कर समझौता करना पड़ता है ?
और सबसे बड़ी बात कैसे कोई पिता अपनी खुद की बेटी का शोषण कर सकता है ?
ऐसी हालत में औरत के पास दो ही रास्ते रह जाते है
या तो अपनी बेटी और खुद को मार ले या फिर दोषी को खुद ही सजा दे दे
और लीला ने जो किया वो किसी भी गैरतमंद माँ के लिए करना जायज था।

गर्व से कहते हम हैं आजाद

July 28, 2021

७३ साल पहले अंग्रेजो को मार भगाया ,
विदेशी ताकतों से पीछा छुड़ाया।
गुलामी की बेड़ियों को तोड़ निकाला,
खुद का अपना गणतंत्र बनाया,
संसार का नक़्शे पर भारत का नाम चमकाया।
इसके लिए कितनो का घर टुटा ,
कितनो का सिंदूर उजड़ा
वीरो ने जान की आहुति चढ़ाई
तब यह आजादी हाथ आयी
हम है आज़ाद देश के वासी,
हमको है अपनी आज़ादी प्यारी
नहीं किसी के गुलाम, अपनी मर्जी के मालिक ,
दुनिया हमसे है हारी
इसीलिए गर्व से कहते हम है आज़ाद ,

हम है उस आज़ाद देश के वासी जहाँ
आज भी नारी समझी जाती पैर की जूती
पुरुष के हाथों जिल्लत सहती
आज भी कन्या भ्रूण को गिराया जाता
दहेज़ न लाने पर लताड़ा जाता
फिर भी गर्व से कहते हम हैं आजाद

कहीं है मंदिर मस्जिद का टकराव
कही है ऊंच नींच में अलगाव
जाति के नाम पर होता खून खराबा
तो कहीं भाषा का है झमेला
कैद है अभी तक धर्म, जाति , प्रान्त भाषा की बेड़ियों में
फिर भी गर्व से कहते हम हैं आजाद

लोकतंत्र के नाम हो रहा है अत्याचार
मुनाफाखोरो, काला बाजारियों ने मचाया हाहाकार
कहीं लाचारी, कहीं बेरोजगारी ,
कहीं अन्यायों की है भीषण चीत्कार
जनता हो रही शोषण का शिकार
फिर भी गर्व से कहते हम हैं आजाद

हर जगह महंगाई का है बोलबाला
कानून के रक्षकों ने किया कानून का मुँह काला
न्याय की कुर्सी पर चलता शासन पैसों का
जनता के सेवक नहीं करते भला किसीका
चारो तरफ छाया भ्रष्टाचार का अंधकार
फिर भी गर्व से कहते हम हैं आजाद

७३ साल की वरिष्ठ हो गयी हमारी आज़ादी
शायद इसीलिए मान देती नहीं आज की पीढ़ी
जैसे भूल जाते बुजुर्गो को ,
वैसे भूल गए शहीदों की क़ुरबानी को
याद है सिर्फ अपनी जेबे भरना,
सोने की चिड़िया को बना दिया वहशी भेड़िया
फिर भी गर्व से कहते हम हैं आजाद

आजाद होकर भी गुलामी की बेड़ियों में जकड़े है हम
बाहरी ताकतों से जीते , हारे है अंदर के दुश्मनो से
जकड़े है रूढ़ियों की बेड़ियों में,
घेरा है सफेदपोशी चोरों ने
गुलाम है अभी तक झूठी मान्यतों के
वश में है अंधविश्वास और पिछड़ी धारणाओं के
फिर भी गर्व से कहते हम हैं आजाद

सिर्फ १५ अगस्त को आती याद आजादी
बाकी समय तो है हर जगह गुलामी
तिरंगी मिठाई, तिरंगी पोशाक, तिरंगा बना कर समां
गाड़ियों पर लगा कागज का तिरंगा ,
निभाते है एक ओपचारिका
२ घंटे मना आज़ादी का जश्न ,बाद सब जाते भूल
पार्टी , पिकनिक कर मनाते स्वतंत्रता दिवस ।
क्षण भर का देशभक्ति का जज़्बा,
बाद में है देश की एकता तोड़ने का मंशा
फिर भी गर्व से कहते हम हैं आजाद

सच्ची आजादी मिलेगी, जब जीतेंगे
जंग अंदरूनी दुश्मनों से,
देशद्रोहियों अराजकताओं का होगा खात्मा
न रहेगा कोई अनपढ़ , न सोयेगा कोई भूखा
हर देशवासी के मन में होगा, देशभक्ति का एहसास

तब गर्व से कहेंगे हम है आज़ाद

अंजू गांधी

भूलना

July 25, 2021

आज उम्र के इस पड़ाव पर और corona काल में जब दिन भर घर में कैद हैं , पुरानी यादें एक सच्ची साथी साबित हो रही है। अभी तक के जिंदगी के सफर में बहुत घटनाएं घटी है , बहुत कुछ देखा है, सहा है, सुना है और समझा है जिनकी चुभन, यादें पूरे शरीर में अभी भी सिहरन पैदा कर रोंगटे खड़े कर देती है , कचोटती रहती है और भुलाये नहीं भूलती है।

आज के newspaper में एक news पढ़ी कि कैसे शराब के नशे में एक पति ने अपनी pregnant पत्नी को मार डाला ।
जैसे भूसे में एक चिंगारी ही काफी होती है आग भड़काने को वैसे ही कोई शब्द या खबर पुरानी यादो को कुरेदने के लिए काफी होता है।
और वैसे ही आज की इस खबर ने कुछ भूली हुई यादो को आग दे दी और मानो मैं वापिस उस समय में पहुँच गयी
सीता की मां सावित्री हमारे घर बरसो से काम कर रही थी। बहुत कम उम्र से ही सीता ने अपनी मां के साथ हमारे घर आना शुरू कर दिया था।
बचपन से ही सीता अपनी माँ के आगे पीछे डोलती रहती थी मानो उसकी माँ ही उसका संसार थी ।
सीता के बड़े होने के साथ साथ ही दोनों का रिश्ता माँ बेटी का कम, सहेलियों जैसा ज्यादा हो गया था ।
हमेशा हंसते रहना, एक दूसरे का दर्द बांटना, मन की बात करना इन दोनो के लिए एक आम बात थी।
पहले मैं सोचती थी कि मां बेटी का ऐसा रिश्ता या तो सिर्फ किताबों में होता है या फिर पढ़े लिखे लोगों के घर जैसा मेरा और मेरी बेटी का है ।
अनपढ़ या गरीब परिवारों में ऐसे रिश्ते नहीं हो सकते. पर इन दोनों को देख कर अपनी गलती महसूस हुई की कैसे हम बिना कुछ जाने धारणाएं बना लेते हैं।
सीता स्कूल से सीधे मेरे घर ही आ जाती थी, और यहीं बैठ कर पढ़ाई के साथ साथ अपनी माँ का हाथ बटाती थी. और अपने स्कूल की , सहेलियों की, इधर उधर की हज़ार बातें करती रहती थी. या फिर टेलीविज़न के सामने बैठ कर न्यूज़ सुना करती थी.।
मैं हमेशा सावित्री को कहती थी कि सीता जितना भी पढ़ना चाहे तो मै उसको पढ़ाऊंगी ।
सीता के स्कूल में कुछ प्रोग्राम होता तो सावित्री सबसे पहले जा कर बैठती थी.
सीता हमेशा कहती थी, मेरी माँ मेरा आदर्श है, वो मेरी मार्गदर्शक, सलाहकार , मेरी सब कुछ है. और वाकई सावित्री एक आदर्श माँ का फ़र्ज़ पूरा कर रही थी.
मै उसको हमेशा कहती थी सावित्री you are an ideal mother, a guide, philosopher, advisor, motivator and the best friend for your daughter.
वो एक ही जवाब देती थी, ” भाभी यह सब English के बड़े बड़े शब्द मुझे समझ नहीं आते पर सीता ही मेरी जिंदगी की आस है, चाहे कुछ हो जाए, मैं उसके सब सपने पूरे करुँगी, उसके बाप कुछ भी कहे, चाहे कितने झगडे हो घर में ,मैं न तो उसकी शादी जल्दी करुँगी , न ही उसकी पढ़ाई आधे में छुडवाऊँगी और उसकी शादी किसी शराबी से तो पक्का नहीं करुँगी. ( मैं जानती थी सावित्री का पति शराब पी कर उसे बहुत मारता था )
पर जो हम सोचते हैं वो होता नही हैं। होता वही है जो किस्मत में लिखा होता है। इंसान का हर सपना पूरा नहीं होता

एक दिन सावित्री के पति ने शराब के नशे में उसको बहुत मारा, जिसके कारण उसके पेट में बहुत चोट लगी और अचानक वो इस दुनिया से चली गई ।
यह खबर सुनते ही मैं तो गहरे सदमे में आ गयी और सबसे पहले मेरेको सीता का ख्याल आया क्या होगा उस बेचारी का?
जब मैं उसके घर उसको मिलने गयी तो जैसी उम्मीद थी सीता का रोते रोते बुरा हाल था, मुझे देखते ही मेरे से चिपक कर दहाड़े मार मार कर रोने लगी और जो उसने उस वक्त कहा , वो दिल को चीरने वाले शब्द मेरे कानो में अभी भी गूंजते हैं वो सिर्फ एक ही बात बोल रही थी, “माँ तूने मुझे सब सिखाया, पर अपने बिना जीना सीखना कैसे भूल गयी”
( mother you taught me every thing but you forgot to teach me how to live without you)

धीरे धीरे समय गुजरता गया, सीता अभी भी मेरे घर कभी कभी आती थी, पर उसके पास अब ज्यादा समय नहीं होता था, स्कूल और उसके बाद घर का सब काम संभालना ।
फिर एक दिन मालूम पड़ा, 16 साल की सीता की शादी उसके शराबी बाप ने अपने ही एक दोस्त के साथ कर दी है।
मैंने उसके घर जाकर उसके बाप को बहुत डांटा और समझाया की कैसे वो 16 साल की मासूम लड़की की शादी 40 साल के आदमी से कर सकता है. मैंने उसके यहाँ तक कहा की मैं सीता को आगे पढ़ाऊंगी, उसका खर्चा भी उठाउंगी ।
पर उसके निर्दयी बाप ने मेरी एक न सुनी. आख़िरकार मुझे कुछ हक़ नहीं था , इसीलिए चुपचाप सीता को आशिर्वाद देकर अपने घर वापिस आ गई।

शादी में बाद सीता जब भी अपने पिता के घर आती, तब मेरे को मिलने जरूर आती. मैं देख रही थी फूल सी सीता धीरे धीरे कुम्हला रही थी।
वो ज्यादा तो कुछ नहीं बताती थी पर एक बार सिर्फ यही बोली, “आंटी नरक से निकल कर जहन्नुम में पहुँच गयी हूँ. मेरी माँ की आत्मा बहुत दुखी हो रही होगी क्यूंकि उसके सब सपने टूट गए है, वो मेरेको जिस जिंदगी से बचाना चाहती थी, वो ही मेरी किस्मत बन गयी है।”
“जो यातना मेरी माँ ने झेली शायद वो सब मेरी किस्मत में लिखी है मेरा पति मेरे को बात बात पर मारता है
एकबार मैं उसकी कमीज़ प्रेस करना भूल गयी तो उसने मेरे को गरम गरम प्रेस से जला दिया ताकि आगे से मैं कभी भी न भूलू “।

मुझे समझ नहीं आ रहा था की में उसको क्या दिलासा दूं? पर
उसको यह जरूर बोली की अन्याय सहना सबसे बड़ा जुल्म है, उसको अपने हक़ के लिए आवाज़ उठानी चाहिए, उसको यहाँ तक बोली कि वो पुलिस की मदद ले सकती है या मैं उसको किसी नारी संस्था से मदद दिला सकती हूँ ।
पर उसने मना कर दिया क्यूंकि वो 16 साल की उम्र में माँ बनने वाली थी । मुझे समझ नहीं आ रहा था की जो खुद अभी बच्ची है वो कैसे माँ बनने की जिम्मेदारी संभालेगी ?
सीता सिर्फ यही बोली, “आंटी क्या मालूम मेरी बच्चा क्या किस्मत लेकर आएगा, लेकिन अगर लड़की हुई और उसकी किस्मत भी मेरी माँ और मेरे जैसी हुई तो क्या होगा” ?
मेरे पास कुछ जवाब नहीं था. और वो भी चुपचाप बिना कुछ कहे सुने चली गई ।
थोड़े दिन बाद मालूम पड़ा की सीता हॉस्पिटल में भर्ती है और उसके पेट पर गहरे घाव लगे है और जबमैं उसको मिलने गयी तो मालूम पड़ा की उसके पति ने शराब के नशे में उसको बहुत मारा था और वो अपना बच्चा खो चुकी थी।
तभी उसका पति वहां आया तो मेरे से रहा ना गया और मैंने उसके पूछ लिया कि ” कैसे वहशी हो तुम, तुमको मालूम नहीं थी की तुम्हारी पत्नी माँ बनाने वाली है? क्यों तुमने उसके साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया? “

और उसने हँसते हुए जो जवाब दिया वो सुन कर तो मैं चक्कर खा कर बैठ गयी, वो बोला , “मैं भूल गया था कि उसके पेट में बच्चा है. आगे से ध्यान रखूँगा , अगली बार पेट पर नहीं मारूंगा”।

थोड़े दिनों के बाद हमने घर बदल लिया और दूसरे इलाके में रहने चले गए और मेरा नाता सीता से टूट गया. मुझे मालूम नहीं अभी उसका क्या हाल है?

हालाँकि कभी कभी मुझे अपने पर बहुत शर्म आती है कि सब जानते हुए भी मैं कुछ कर न पायी और सीता को उस दरिंदे के चंगुल से बचा ना पायी ।

जब भी मैं सीता की कहानी से मिलती जुलती कोई बात सुनती हूँ या पढ़ती हूँ मुझे सावित्री और सीता की याद आ जाती है।
मैं जानती हूँ हमारी समाज में हजारो लाखो ऐसी सीता और सवित्रिया है सो नरक जैसी जिन्दगी बिता रही हैं और हम so called concerned citizens कुछ नहीं कर पाते
सिर्फ भूली हुई बातो को याद करके दो मिनट दुखी हो लेते है और फिर वापिस अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाते है.

भूलना चाहती हूँ ,लाख कोशिशें भी की
लेकिन भुला पाती नहीं
ज़िंदगी में मिले कुछ लोग , कुछ लम्हे, कुछ क़िस्से,
दिल में छुपे कुछ जख़्म जो रखे है संभाल कर
देते रहते है टीस याद आने पर
कोई सीखा दे दिल के घावों को कैसे भुलाया जाता है
दर्द न दे ये नासूर , इनपर क्या लगाया जाता है?

Forgot- भूलना

July 24, 2021

भूल जाओ जो हो गया, भूल जाओ जो बीत गया
जीवन में आगे बढ़ना है तो भूलना ही पड़ेगा
भूलोगे तभी स्वस्थ रहोगे ,रोज सुनते सुनते थक गयी
क्या भूलना है क्या रखना है याद ?
सोच सोच हो गयी हूँ परेशान
जो भूलना चाहिए वो रहता है याद
और जो रहना चाहिए याद वो हम जाते है भूल
भूलने ना भूलने की भूल भुलैया की उलझन में
कहीं ऐसा न हो एक दिन आए कि भूलना ही जाएं भूल

माँ की ममता , पिता का दुलार, दोस्तों का साथ
बचपन की यादें , जवानी की अठखेलियां ,
गुरुओं को धन्यवाद , बड़ो का आदर ,
इंसान की इज़्ज़त, मानवीय भावना, दूसरों के लिए हमदर्दी
बच्चों का विश्वास ,पुरानी यादें , खुशी के पल
धर्म के नाम पर झगड़े, प्राकृतिक नेमतों का आभार
भगवान पर श्रद्धा, लोगों का एहसान ,
दूसरों के गुण मदद करने वाले का हाथ
नारी का शोषण, अधखिली कलियों का बलात्कार
निर्दोषो पर अत्याचार ,मासूमों को बेवजह सजा,
रहने चाहिए याद पर अक्सर जाते है भूल

आत्मसम्मान को ठेस, दिल की चुभन,
अहम का टकराव ,अतीत की यादें
अपनों का तिरस्कार, दुख के पल, आपसी झगडे
लोगों के वचन, अपनी जलन, लालच , द्वेष
दूसरो के अवगुण और मजबूरी, अपनी तकलीफे
भूलना चाहिए , पर रहते है हमेशा याद

भूलने की भी है अलग दुनिया
कोई भूल कर पाता सजा, कोई भूल कर नाम कमाता

विद्यार्थी होमवर्क करना भूल जाए तो मिलती है सजा
वाहन चालक ब्रेक लगाना भूल जाय तो दे जान गंवा
मां बाप भूल जाय संस्कार सिखाना तो आने वाली पीढ़ी हो जाए गुमराह
पर
नेता भूल जाए वादे तो भी देश चलाता
कानून के रखवालों का फ़र्ज़ है जनता की सुरक्षा
भूल जाते है अपना फ़र्ज़ , याद रहता सिर्फ अपनी जेबें भरना
न्याय की कुर्सी पर है जो विराजमान, उनको नहीं है भान
निर्दोषों को न्याय देना उनका है काम, पर ये भूल देते है पैसे को मान

कैसे है लोग यहां, अपने मतलब के लिए खाते है शपथ
फिर तोड़ देते है वादे, भूल जाते है कसम
किस किस का नाम ले , किस किस को दोष दे
भूल कर सब रिश्ते नाते हर कोई यहाँ स्वार्थ में अंधा
दुसरो की गलती निकालने को है यहाँ हर कोई तैयार
भूल जाते झांकना अपने गिरेबान में एक बार

भूल गए उन शहीदों को जिन्होंने देश के लिए दिए अपने प्राण
भूल गए उन माँ बाप को जिन्होंने किये अनगिनत त्याग
सुख के दिन आते ही भूल जाते है दुख की घडियाँ
भूल रिश्ते नाते , बना लेते है अपनी नयी दुनिया
जब तक है किसी से काम, बिठा लेते है सिर आंखों पर
काम निकल जाने के बाद गिरा नीचे, देते है भुला

चलो करे आज एक काम बुराई को भूले अच्छाई को रखे याद
भूल जाए आपसी नफरत, मानवता को करे प्रणाम
निभा सको तो करो ये वादा, पर फिर तोड़ना ना वादा ये कहकर
I am sorry, I forgot

Warm/गर्म/ गर्माहट

July 18, 2021

दिसंबर की सर्दी में रजाई में बैठ चाय के कप को दोनों हाथो के बीच दबाये सरिता कप की गर्मी को महसूस कर रही थी और पुराने दिनों के यादो में खोयी हुई थी ।
पुरानी यादें मानो किसी फिल्म की तरह उसकी आँखों के सामने एक के बाद एक घूम रही थी।

दिल्ली की सर्दियों में अपनी माँ से चिपक कर उसके मुलायम पेट को पकड़ कर माँ के स्पर्श की गर्मी का एहसास आज भी उसको सहला जाता है। बचपन की इस याद से जुड़ी कितनी बातें उसे हमेशा याद आ जाती है। मई जून की गरम रातों में छत पर सोना, सर्दियों में रात को अंगीठी के सामने बैठ हाथ सेकते हुए गर्म गर्म मूंगफली खाना, रजाई की गर्माहट छोड़ कर सुबह सुबह ना उठने के बहाने बनाना।

उसे अचानक याद आया, दिसंबर के महीने में शादी के बाद दिल्ली से मुंबई आने पर कैसे उसने अपने पति से रात को जिद करी थी गरम गरम गाजर का हलवा खाने की, और नया नया पति बेचारा अपनी नई दुल्हन को समझते समझते थक गया था की मुंबई में हलवाई के पास दिल्ली की तरह गरम हलवा नहीं मिलता।

फिर उसको याद आया कैसे उसकी बेटी समीरा उसकी गोदी में सिर रख कर सोती थी और वो उसके बालों में उंगलियां घुमाते घुमाते समीरा की दिन भर के बातें सुनती थी।

एक दिन समीरा आकर उसको बोली थी ,” माँ आप सबसे अच्छी हो. जानती हो आज मेरे एक दोस्त ने क्या कहा? वो बोला समीरा your mother is so warm hearted . I feel more close to her than my Mom. हम उनके पास बैठ कर सब दिल के बाते कर सकते है और हम जानते है वो बहुत ध्यान से और प्यार से हमारी problems solve करेंगी” सच मम्मी मुझे इतना गर्व महसूस हुआ आप पर.. Yes mummy you are the best.

सरिता को यह सुनकर बहुत ख़ुशी हुई और फिर याद आया,कैसे वो भी अपने स्कूल के दिनों में चाहती थी की उसकी मम्मी उसकी सहलियों से बैठ कर बात करें . पर उन दिनों माँ के पास समय ही किधर होता था और सरिता को बहुत दुःख होता था जब उसकी दोस्त घर आती थी और उसकी माँ उनके पास बैठ कर बात नहीं करती थी. तभी उसने निश्चय कर लिया था की जब उसके बच्चे होंगे तब वो इस बात का ध्यान रखेगी की अपने बच्चो के दोस्तों के पास बैठ कर उनसे बात करें।

शादी के बाद जब वो अपनी ननद को या पति को अपनी सास की गोदी में सिर रख कर सोता देखती थी तब उसका बहुत मन करता था की काश कोई उसे भी अपने गले से लगा कर अपनी ममता की बौछार करे , उसे पास बिठा कर उसके दिल का हाल पूछे।

पर उसकी जिंदगी में तो एक टीवी serial या कहानियों वाली सास लिखी थी जो मानती थी की बहु को बहु बना कर रखना चाहिए, ज्यादा प्यार नहीं जताना चाहिए। एक बार उसने कोशिश भी करी थी, सास के पास बैठ उनके हाथो की गर्मी को महसूस करने को, उनसे अपनी माँ के जैसे चिपटने को. पर सास ने उसकी इस प्यार की भावना को झटक दिया और बोली बहु अपनी मर्यादा में रहो।

तब उसने एक और निश्चय किया था कि वो अपनी बहू के साथ रूढ़िवादी सास की तरह बिलकुल नहीं रहेगी. जो उसने जिंदगी में चाहा और नहीं मिला वो कोशिश करेगी कि उसकी बहु को कभी भी उससे शिकायत न रहे।

हालाँकि बेटे के शादी के पहले परिवार के कई शुभचिंतकों ने उसको बहुत पाठ पढाये , बहुत शिक्षा दी थी बहु से कैसे व्यवहार करने का, दोनो के बीच फासला रखने का।
उसको ये तक कहा गया बहु बेटी में फरक होता है, बहु कभी बेटी नही बन सकती।

सरिता कई बार सोचती की क्यों मेरे इतने कान भरे जा रहे है उस बहु के खिलाफ जो अभी घर आई भी नहीं है।
पर उसने सोच लिया था, चाहे कुछ भी हो जाए, वो किसी के कहने में नहीं आएगी, और वो ही करेगी जैसा उसका मन कहता है ।

जिस तरह से एक छोटे से पौधे को सींचने के बाद ही वो बड़ा होकर फल देने लायक बनता है. ठीक उसी प्रकार हर रिश्ते को भी प्यार से सींचने की जरूरत होती है। उसने निश्चय कर लिया था की वो अपने और अपनी बहू के रिश्ते को अपने प्यार की गर्मी से सींचेगी। और उसे बहु का जायज प्यार देगी।

इसीलिए बहु के घर आते ही अपने पास बिठा कर समझाया था की ,” अगर हम चाहते हैं कि रिश्ते में गर्माहट बनी रहे तो एक-दूसरे की छोटी-छोटी खुशियों का ध्यान रखना जरूरी है, मेरे लिए तुम और समीरा दोनों एक समान है. मेरे व्यवहार में दोनों के लिए कोई फर्क नहीं होगा. जैसे में अपनी समीरा के अस्तित्व का सम्मान करती हु वैसे ही तुम्हारे अस्तित्व का सम्मान करुँगी। मेरी दिल में तुम्हारे और समीरा के लिए बहुत जगह है। कोई किसी का स्थान नहीं लेगा बल्कि दोनो बराबर एक साथ रहेंगी मेरे दिल में, मेरी जिंदगी में।

बस तुम्हे भी मेरेको अपना समझना होगा और किसी के भी भड़काने में नहीं आना होगा. कुछ भी धारणा बनाने से पहले मुझसे आकर खुल कर बात करना । मन ही मन मत घुटना।

अलबत्ता सरिता ने अपने दिल की बात सुधा यानी बहु से कर तो ली थी, पर उसके मन में हमेशा यह अंदेशा रहता था की सुधा कहीं उसको पराया तो नहीं समझती, क्यूंकि सुधा ने कभी भी अपनी मन की भावना सरिता पर जाहिर नहीं करी थी.

सरिता यह सब सोच ही रही थी की अचानक सुधा , उसकी बहु कमरे में आयी और उसकी रजाई में घुस सरिता के पास ही सिमट गयी. और बोली , ” मम्मा , आपको छू कर मुझे ऐसा लगता है कि जैसे में अपनी मम्मी को छू रही हहूँ , वोही गर्माहट, वो ही अपनापन, वो ही मेरी रगों में गर्मी का एहसास होता है ” ।अनायास ही सरिता के हाथ सुधा के बालों को सहलाने लगे थे और उसकी आँखों से टप टप आंसू गिरने लगे. सुधा हक्की बक्की रह गयी सरिता के आँसुओं को देख कर, बोली मम्मा क्या हुआ, मैंने कुछ गलत कह दिया,

सरिता को समझ नहीं आ रहा था की वो सुधा को क्या समझाए और क्या कारण बताये अपनी आंख से गिरती गंगा जमुना का। ये तो ख़ुशी के ऑंसू थे. यही तो वो चाहती थी कि सुधा उसमें अपनी माँ की छवि ढूँढे

सरिता को अचानक लगा ही उसके शरीर में गरम खून जोरों से दौड़ रहा है और सुधा को अपने और करीब लाते हुए उसने सुधा का माथा चुम लिया।
सरिता और सुधा दोनो ने एक दूसरे के प्यार की गर्माहट को महसूस करते हुए भगवान को हाथ जोड़ इस प्यार के लिए धन्यवाद दिया।